वे 'अब्दुल' को नेता नहीं बनने देना चाहते...हम नेहरू, गांधी या यादव में से किसी को अपना नेता नहीं बनाएंगे। हमारी पार्टी युवा मुसलमानों को एक ऐसा मंच देने के लिए काम कर रही है, जहां से वे नेता के रूप में उभर सकें और पीड़ितों को न्याय दिला सकें।
ये बयान है AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का। बयान से भी अहम यह है कि ओवैसी यह बात किस जगह से कह रहे हैं। दरअसल ये जगह उत्तर प्रदेश में कैराना है। इस एक बयान के जरिये ओवैसी ने यूपी चुनाव में अपनी पार्टी का विजन से लेकर टोन तक सेट करने की कोशिश की है।
2027 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके लिए ओवैसी सियासी रूप से सबसे अहम सूबे उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ओवैसी जब 'अब्दुल को नेता नहीं...' वाला सवाल उठाते हैं तो उनके निशाने पर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस से लेकर बसपा सीधे तौर पर नजर आती है।
अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में करने के लिए समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बीएसपी से लेकर AIMIM ने कोशिश शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने हाल ही में आजम खान से मुलाकात की है।
कांग्रेस ने सांसद इमरान मसूद को यूपी में प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में करने के लिए एक बार फिर ओवैसी भी मैदान में उतर चुके हैं। ओवैसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक रैलियां कर रहे हैं।
यूपी में ओवैसी फैक्टर
साल 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19.26% है। ये कुल मतदाताओं का लगभग 19 से 20% हिस्सा बनाती है। यूपी में 70 से अधिक विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है। पारंपरिक रूप से मुस्लिम समाजवादी पार्टी (SP), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक रहे हैं। इससे वे नतीजों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। उसे कुल वोटों का करीब 0.5 प्रतिशत हिस्सा मिला। पार्टी के उम्मीदवारों को लगभग 4.5 लाख वोट मिले। इससे पहले, 2017 में AIMIM ने यूपी में 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था। पार्टी को कुल वैध मतों का मात्र 0.24% वोट मिला था और 37 सीटों पर प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी।
मुस्लिम वोटर उन विधानसभा सीटों पर अहम भूमिका निभाते हैं जहां उनकी संख्या ज्यादा है। ऐसे में इतना तय है कि कई सीटों पर AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी की तरफ से अपने उम्मीदवार उतारने के फैसले से चुनावी समीकरण और उलझ सकते हैं। इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को हो सकता है।
यहां एक बात ध्यान रखने वाली यह है कि, आम धारणा के विपरीत कि मुसलमान भाजपा के खिलाफ वोट कर रहे थे, उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को कुछ प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे। CSDS-लोकनीति के चुनाव-बाद सर्वेक्षण से पता चला कि कम से कम 8% मुस्लिम वोट बीजेपी को मिले।
इसके अलावा, 2024 के चुनावों में भाजपा ने राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के साथ गठबंधन किया है, जिसे अपने मजबूत इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलता रहा है। यहां तक कि पहले चरण के प्रचार के दौरान भी, मुस्लिम बहुल इलाकों में भाजपा नेता RLD नेताओं के साथ मौजूद थे।
सपा से सीधी लड़ाई के मूड में ओवैसी
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के शीर्ष नेता AIMIM के साथ किसी भी तरह के तालमेल से लगातार इनकार करते रहे हैं। सपा नेता आरोप लगाते हैं कि ओवैसी भाजपा की 'बी-टीम' के रूप में काम करते हैं ताकि धर्मनिरपेक्ष वोटों को काटा जा सके। ऐसे में 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी को लेकर तल्ख तेवर दिखा रहे हैं।
ओवैसी ने आजमगढ़ और फिरोजाबाद जैसी सीटों पर मुस्लिम नेताओं के प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर सीधा निशाना साधा है। ओवैसी का कहना है कि समाजवादी पार्टी का नाम बदलकर 'समाजवादी यादव परिवार' रखना चाहिए। वह आजमगढ़ और फिरोजाबाद जैसी सीटों पर मुस्लिम नेताओं के प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं।
ओवैसी मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने के लिए समाजवादी पार्टी पर सीधा निशाना साध रहे हैं। ओवैसी का आरोप है कि जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब इन दंगों के दौरान लगभग 50,000 लोग अपने घरों से बेघर हो गए थे। AIMIM प्रमुख ने यह भी आरोप लगा रहे हैं कि दंगों के दौरान लड़कियों पर हमले हुए, बच्चे अनाथ हो गए और जो परिवार पीढ़ियों से अपने गांवों में रह रहे थे, वे बेघर हो गए। ओवैसी सीधे सवाल कर रहे हैं कि 'उस समय किसकी सरकार थी? वह समाजवादी सरकार थी। मुख्यमंत्री कौन था? अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे।'
वोट काटने की छवि?
असदुद्दीन ओवैसी की रैलियों में पश्चिमी यूपी और मुस्लिम इलाकों में भारी भीड़ जुटती है, लेकिन अब तक वह भीड़ ईवीएम (EVM) में वोटों में तब्दील नहीं हो पाई है। ओवैसी खुद को मुसलमानों के मसीहा के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि उनके आलोचकों का आरोप है कि इससे ओवैसी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। पिछले यूपी विधानसभा चुनावों के नतीजों ने यह दर्शाया था कि ओवैसी के काम करने का तरीका सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को मिलता है। पिछले विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर ओवैसी के उम्मीदवारों ने ऐसे वोट हासिल किए, जिन्हें अगर SP-RLD गठबंधन के वोटों में जोड़ दिया जाता, तो BJP की हार हो सकती थी।
यूपी में, चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 29 ऐसी सीटें रहीं जहां जीत का अंतर 2000 वोटों से कम है। इन 29 सीटों में से 11 सीटों पर जीत का अंतर 500 से कम है, 4 सीटों पर 500 से 1000 के बीच है, और 14 सीटों पर 1000 से 2000 वोटों के बीच है।
UP और बिहार, दोनों ही जगहों पर सत्ता की मुख्य दावेदारों ने अलग-अलग कारणों से AIMIM के साथ गठबंधन करने से परहेज किया। बिहार 2020 के चुनावों में, AIMIM 'महागठबंधन' का हिस्सा नहीं बन सकी, क्योंकि सीटों को लेकर उसकी मांग RJD और कांग्रेस नेताओं को मंजूर नहीं थी।
UP में, समाजवादी पार्टी (SP) ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के डर से AIMIM को लगभग अछूत जैसा मान लिया था। ऐसा होने से अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली पार्टी को नुकसान हो सकता था। इससे पता चलता है कि BJP का विरोध करने वाली पार्टियां अगर ओवैसी को नजरअंदाज करती हैं, तो उन्हें इसका भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नवंबर 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में भी, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली RJD की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सत्ता छीनने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए 'ओवैसी फैक्टर' को जिम्मेदार ठहराया गया था। इससे पहले दो बार असफल रहने के बाद, ओवैसी की पार्टी AIMIM बिहार के सीमांचल इलाके में पांच सीटें जीतने में कामयाब रही, जहां मुस्लिम आबादी काफी अच्छी-खासी है। ओवैसी की इस जीत को RJD-कांग्रेस गठबंधन (महागठबंधन) के नुकसान के तौर पर देखा गया।
महाराष्ट्र : स्थानीय निकाय में असरदार ताकत
इस साल के शुरुआत में महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में AIMIM ने अपने प्रदर्शन से सबको हैरान कर दिया। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र के 13 नगर निगमों में 126 कॉर्पोरेटर सीटें जीतीं। यह संख्या NCP(SP) की सीटों से लगभग तीन गुना अधिक है।
AIMIM की सीटों का आंकड़ा शिवसेना (UBT) की सीटों से सिर्फ 30 कम है। पार्टी ने संभाजीनगर, मालेगांव, नांदेड़, अमरावती, धुले, सोलापुरा और बीएमसी में बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी ने शहरी क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों का भरोसा जीतने में कामयाब रही है। यह दिखाता है कि पारंपरिक मुस्लिम वोटर कांग्रेस, एनसीपी जैसे दलों को छोड़कर ओवैसी की पार्टी में भरोसा दिखा रहे हैं। इससे पहले 2017 नगर निगम चुनाव में AIMIM ने 81 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
ओवैसी की पार्टी ने बीएमसी में 8 सीटों पर जीत हासिल की। 2017 में उसे दो सीटें मिली थीं। AIMIM ने मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी (SP) की जगह ली और 5 ऐसी सीटें जीतीं जो पहले SP का गढ़ हुआ करती थीं। महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि AIMIM भले ही विधानसभा या लोकसभा चुनावों में ज्यादा सीटें नहीं जीत पाती, लेकिन शहरी स्थानीय निकायों में यह महाराष्ट्र के मुस्लिम बहुल इलाकों की एक मुख्य और असरदार राजनीतिक ताकत बन चुकी है।
बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली निराशा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 0.09% (57,253) वोट हासिल किए। पार्टी ने मुख्य रूप से राज्य के मुस्लिम बहुल और सीमावर्ती जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बर्धमान और उत्तर दिनाजपुर जिलों कुल 12 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।
AIMIM राज्य में एक भी सीट पर खाता नहीं खोल पाई। अधिकतर सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। राज्य के मुस्लिम मतदाताओं ने वोटों के बंटवारे से बचने और मुख्य मुकाबले में भाजपा और टीएमसी के बीच अपना सीधा रुख तय किया। ऐसे में मुस्लिम वोटरों ने ममता की पार्टी को ही वोट दिया।
दिल्ली चुनाव में AIMIM का प्रदर्शन
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) कोई सीट तो नहीं जीत पाई, लेकिन उसके दोनों उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे। एक सीट पर, जहां अल्पसंख्यक आबादी काफी अधिक थी, वोटों के बंटवारे ने BJP की जीत का रास्ता आसान कर दिया।
AIMIM ने दिल्ली चुनाव में दो उम्मीदवार ओखला से शिफा उर रहमान खान और मुस्तफाबाद से ताहिर हुसैन को टिकट दिया था। दोनों AIMIM उम्मीदवार कांग्रेस को चौथे नंबर पर धकेलने और खुद तीसरे नंबर पर रहने में कामयाब रहे।
ओखला में, AAP नेता और मौजूदा विधायक अमानतुल्लाह खान 23,639 वोटों से जीते। BJP के मनीष चौधरी दूसरे नंबर पर रहे और तिहाड़ जेल में बंद शिफा उर रहमान खान को 39,558 वोट मिले। कांग्रेस की अरीबा खान को 12,739 वोट मिले।
अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे के बावजूद, तीन बार के विधायक खान अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। लेकिन उनकी जीत का अंतर 50,000 से अधिक वोटों से कम हो गया। लगभग 40% मुस्लिम आबादी वाले मुस्तफाबाद सीट पर बीजेपी के मोहन सिंह बिष्ट 17,578 वोटों के अंतर से जीते।
AAP के अदील अहमद खान को 67,637 वोट मिले, AIMIM के ताहिर हुसैन को 33,474 वोट मिले और कांग्रेस के अली मेहदी को 11,763 वोट मिले। विपक्ष के वोटों के बंटवारे से BJP को आसानी से जीतने में मदद मिली।
यूपी में चंद्रशेखर से होगा गठबंधन?
चुनाव से पहले वर्तमान स्थिति यह है कि बड़े क्षेत्रीय दल (सपा/बसपा) ओवैसी से गठबंधन को लेकर परहेज कर रहे हैं। इन दलों को लगता है कि यदि वे ओवैसी से गठबंधन करेंगे तो इससे हिंदू वोटों के बीजेपी के पक्ष में जवाबी ध्रुवीकरण (Counter-Polarisation) का जोखिम बढ़ जाएगा। इस स्थिति में ओवैसी के पास यूपी की राजनीति में मुख्यधारा के दलों से दूरी बनी रहेगी।
AIMIM की सबसे व्यावहारिक संभावना केवल गैर-यादव ओबीसी, दलित या छोटे क्षेत्रीय संगठनों (जैसे अपना दल-कमेरावादी, आजाद समाज पार्टी या छोटे जन-अधिकार संगठनों) के साथ एक तीसरा/चौथा मोर्चा बनाने की ही बनती है। साल 2022 में ओवैसी ने बाबू सिंह कुशवाहा (जन अधिकार पार्टी) और वामन मेश्राम के साथ मिलकर 'भागीदारी परिवर्तन मोर्चा' बनाया था।
पिछले साल बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद के बीच हुआ सांकेतिक गठबंधन हुआ था। ऐसे में अगर दोनों दल इस साझेदारी को उत्तर प्रदेश तक बढ़ाते हैं, तो यह अखिलेश यादव के लिए खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में,एक बड़ी चुनौती बन सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 11 जिलों (गन्ना बेल्ट) में 96 विधानसभा सीटें हैं। इन इलाकों में मुस्लिम-दलित गठबंधन लगभग 40 सीटों पर नतीजों को निर्णायक रूप से बदल सकता है।
अगर उत्तर प्रदेश में ओवैसी-आजाद गठबंधन आकार लेता है, तो इस गठबंधन को नजरअंदाज करना या योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एक बड़े मोर्चे में उन्हें शामिल करने की मांगों को खारिज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।