यूक्रेन के साथ संघर्ष के बीच रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भारत को नसीहत देने वाले अमेरिका की दोहरी नीति अब खुलकर सामने आ गई है। मिडटर्म चुनाव, वैश्विक बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों और घरेलू जरूरतों के दबाव के बीच अमेरिका ने रूस से डीजल की सप्लाई को लेकर समझौता किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत के बाद हुए समझौते के बाद रूस से डीजल की पहली खेप अमेरिका के लिए रवाना हो गई है।
दिलचस्प बात यह है कि जो अमेरिका रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगातार उंगली उठा रहा था और भारी टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा था, अब खुद रूस से तेल खरीदने पर विवश हो गया है। अगस्त में वाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने कूटनीतिक मर्यादाओं को लांघते हुए यूक्रेन में चल रहे संघर्ष को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया था और इसे ‘मोदी का युद्ध’ करार दिया था। नवारो के इस बयान को बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना बताया गया था।
नवारो ने क्या कहा था?
एक इंटरव्यू के दौरान नवारो ने भारत पर आरोप लगाया था कि वह रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता है, उसे रिफाइन करके दूसरे देशों में बेचता है और इससे रूस को कमाई होती है। उन्होंने भारत पर रूस की ‘वॉर मशीन’ को फंड करने का आरोप भी लगाया। नवारो ने साफ तौर पर कहा था कि अगर भारत रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे, तो उस पर लगाया गया 25% अतिरिक्त टैरिफ तुरंत हटाया जा सकता है।
नवारो ने यहां तक कहा था कि अमेरिका में उपभोक्ताओं, कारोबारियों, कामगारों और टैक्सपेयर्स को भारत की इस नीति की कीमत चुकानी पड़ रही है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह “पुतिन का युद्ध” कहना चाहते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, “मेरा मतलब मोदी का युद्ध है, क्योंकि शांति का रास्ता कुछ हद तक नई दिल्ली से होकर जाता है।”
’कूटनीतिक शालीनता की सारी हदें पार’
पीटर नवारो के विवादित बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए RT इंडिया के मैनेजिंग एडिटर अशोक बागड़िया ने इसे बेतुका और गैर-जिम्मेदाराना बताया। बागड़िया के मुताबिक, नवारो ने सार्वजनिक कूटनीति में शालीनता की सीमा पार कर दी है। ये पीएम मोदी को टारगेट करने का नया तरीका है।
उन्होंने यह भी कहा कि नवारो ने पहली बार ऐसा नहीं किया है। वह लगातार भारत सरकार को निशाना बनाते रहे हैं। कभी भारत को ‘टैरिफ का महाराजा’ कहते हैं, तो कभी ‘रूस की लॉन्ड्री की दुकान’। उनका सीधा सा मतलब यह है कि अगर भारत उनकी बात मान लेता है, तो ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ में राहत दी जा सकती है।