भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो... किसका होगा फायदा? एक्सपर्ट से समझिए

अमेरिकी विदेश मंत्री भारत दौरे पर हैं। अपने दौरे पर अमेरिका के रुख में बड़ा बदलाव दिखाया। इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच ट्रेड डील बेहद करीब होने की भी बात कही। साथ ही, उन्होंने भारत के एनर्जी सोर्स की विविधता लाने पर भी समर्थन किया।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। रूबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ मुलाकात की। इस दौरान रूबियो ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील बेहद करीब पहुंच चुकी है। खास बात है कि रूबियो ने भारत के अपने एनर्जी पोर्टफोलियो में विविधता लाने के प्रयासों का समर्थन किया।

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि भारत ने बार-बार यह इच्छा जताई है कि वह अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाना चाहता है, जो कि एक समझदारी भरा कदम है। ऐसा रातों-रात कर पाना आसान नहीं है। मुझे लगता है कि उन्होंने इस दिशा में काफी अच्छी प्रगति की है, और यह देखकर हमें खुशी है।" इसके साथ ही रूबियो ने भारत को रिफाइनिंग का सुपरपावर भी बताया। ऐसे में सवाल है कि रूबियो के इस भारत दौरे से किसका फायदा होगा।

भारत के पारंपरिक रुख का समर्थन

पूर्व राजनयिक महेश सचदेव ने कहा कि अमेरिका ने आखिरकार भारत के उस पारंपरिक रुख का समर्थन किया है और उसे सही माना है कि कच्चे तेल के तीसरे सबसे बड़े इंपोर्टर और कंज्यूमर के रूप में, भारत के पास ऐसा बाजार और ताकत है कि वह अपनी एनर्जी सिक्योरिटी सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग सोर्स से तेल खरीद सके।

उन्होंने कहा कि खाड़ी और अन्य जगहों पर अमेरिका की कार्रवाइयों की वजह से एनर्जी सिक्योरिटी का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। रूस के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई है। इसलिए, अमेरिका को अब यह समझ आ गया है कि वह अपने एजेंडे के हिसाब से भारत को नहीं चला सकता।

पूर्व राजनयिक ने बताया कि पिछले महीने अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित 'लिंडसे ग्राहम एक्ट' के तहत, अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल इंपोर्ट करने वाले पांच सबसे बड़े देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। यह एक घरेलू कानून है, लेकिन इसका असर देश की सीमाओं के बाहर भी पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि आखिरकार, अमेरिका का कोई घरेलू कानून यह तय नहीं कर सकता कि भारत कहां से क्या खरीदे। और हमने इसी बात पर आपत्ति जताई थी। हम तेल की खरीद के स्रोतों में विविधता लाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ऐसा इस तरह से किया जाना चाहिए जिससे भारत के हितों की रक्षा हो और भारत की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा जरूरतों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

अमेरिका सपोर्ट की वजह क्या है?

क्या अमेरिका की ओर से मिल रहा यह सपोर्ट, साझेदारी की भावना से आ रहा है या फिर उनकी अपनी जरूरत की वजह से? सऊदी में एक और रिफाइनिंग फैसिलिटी आरामको' (aramco), पर हमला हुआ है। इसलिए, इस समय उनके पास वास्तव में कोई और विकल्प नहीं है।

पूर्व राजनयिक सचदेव ने कहा कि यह कुछ हद तक साझेदारी का मामला तो है ही, लेकिन साथ ही यह स्थानीय खपत और मजबूरी का भी सवाल है। अमेरिका के मध्यावधि चुनाव (midterm elections) होने वाले हैं। 28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका में डीजल और गैसोलीन की कीमतें बढ़ गई हैं।

यह रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक बड़ी समस्या है। राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में अपना बहुमत बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

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अमेरिका के पास बेचने के लिए कच्चा तेल और LPG है, जिसकी भारत को जरूरत है ताकि खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। वेनेजुएला से भी कच्चा तेल आ रहा है जो काफी गाढ़ा और भारी किस्म का है। रिलायंस के पास इसे रिफाइन करने की क्षमता है। इसलिएरिलायंस के जामनगर प्लांट का दौरा अमेरिका के लिए काफी मायने रखता है। यह दोनों पक्षों के लिए फायदे की स्थिति है।
महेश सचदेव
महेश सचदेव
पूर्व डिप्लोमेट और विदेश मामलों के जानकार

उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोग डीजल की कीमतों में 70% तक और गैसोलीन की कीमतों में 35-36% तक की बढ़ोतरी से खुश नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका में लगभग सारा ट्रांसपोर्ट इन्हीं दो हाइड्रोकार्बन (डीजल और गैसोलीन) पर निर्भर है। इसी वजह से, आम महंगाई दर बढ़कर 3.7% के उच्च स्तर पर पहुंच गई है।

पूर्व राजनयिक ने कहा कि इन सब हालात के चलते राष्ट्रपति ट्रंप और उनका प्रशासन राहत के उपाय (कम से कम मनोवैज्ञानिक स्तर पर) खोजने में जुट गया है। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं को यह भरोसा दिलाया जा सके कि सरकार उनकी परेशानियों के प्रति उदासीन नहीं है और जल्द ही कोई कदम उठाएगी।

पूर्व राजनयिक ने कहा कि ट्रंप ने बाजार को शांत करने के लिए यह कहना शुरू किया कि ईरान के साथ युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा और उसके बाद तेल की कीमतें पहले से भी निचले स्तर पर आ जाएंगी। लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा वादा कई बार किया जा चुका है, जिसका कोई व्यावहारिक नतीजा नहीं निकला।

उन्होंने कहा कि इन सब बातों को देखें तो, एक तरफ यह उनकी हताशा को दिखाता है, तो दूसरी तरफ यह अमेरिका की अपनी ही नीति में मौजूद एक बड़े विरोधाभास को भी दूर करता है। वे खुद रूस से डीजल कैसे खरीद सकते हैं, जबकि वे भारत, चीन या अन्य देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं।

भारत या अमेरिका : रूबियो के दौरे से किसका फायदा

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्कियो रूबियो के इस दौरे और इस समझौते से किसे अधिक फायदा होगा। भारत के पास रिफाइनरी हैं, दूसरी तरफ अमेरिका अपनी ज्यादा तेल बेचना चाहता है। ऐसे में सवाल है कि क्या यह भारतीय बिजनेस के लिए भी एक अच्छा मौका है?

इस सवाल के जवाब में पूर्व राजनयिक ने कहा कि मुझे ऐसा ही लगता है। यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद (win-win) स्थिति है। अमेरिका के पास बेचने के लिए कच्चा तेल (crude oil) और LPG है।

ऐसे में खाड़ी देशों से होने वाली सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए भारत को इसकी जरूरत है। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला से भी कच्चा तेल आ रहा है। हालांकि, ये काफी गाढ़ा और भारी है। रिलायंस के पास इसे रिफाइन करने की क्षमता है। इसलिए, अमेरिका के लिए रिलायंस के जामनगर प्लांट का दौरा काफी अहम हो जाता है। तो, यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है।