ट्रंप ने मार्को रूबियो को दिल्ली क्यों भेजा, पूर्व राजदूत ने RT पर बताया असल मकसद

भारत के पूर्व राजदूत दीपक भोजवानी ने RT India से बातचीत में कहा कि वॉशिंगटन लंबे समय से भारत को लेकर गलत आकलन करता रहा है। लेकिन अब उसे परिस्थितियां समझ आने लगी हैं।

डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद से ही भारत और वॉशिंगटन के रिश्ते कई तरह की चुनौतियों से गुजर रहे हैं। अमेरिका ने मनचाही ट्रेड डील करने के लिए दबाव डालने की कोशिश की, मगर भारत नहीं माना। पिछले महीने रूस से तेल खरीदने पर भारत जैसे देशों पर 100 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का कानून बना दिया। मगर जब अमेरिका में डीजल को लेकर त्राहिमाम मचा तो पलटी मार दी, कानून को ठंडे बस्ते में डाल दिया।रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात के बाद लाखों मिलियन बैरल डीजल की डील का ऐलान करना पड़ा।

ट्रंप इस डीजल डील को अमेरिकी लोगों की जरूरत बताया। जबकि यही बात भारत लंबे समय से कहता आ रहा है कि वह उसी देश से तेल या अन्य ईंधन खरीदेगा, जहां से उसे सस्ता मिलेगा क्योंकि उसे 140 करोड़ देशवासियों की ऊर्जा जरूरतों का ध्यान रखना है। अब ट्रंप ने अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो को भारत भेजा है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि रूबियो के भारत आने के क्या मायने हैं?

अमेरिका को पता चली भारत की अहमियत

इस सवाल के जवाब में भारत के पूर्व राजदूत दीपक भोजवानी ने RT India से बातचीत में कहा कि भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने पिछले हफ्ते ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक फोरम में और उससे पहले न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी में बयान दिए हैं। इन बयानों को देखने से स्पष्ट है कि यह अतीत की तुलना में एक अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण है। भारत से रिश्तों में आई गिरावट को लेकर अमेरिका खुद को रीपोजिशन कर रहा है, यानी अपनी स्थिति बदल रहा है। एशिया सोसाइटी फोरम में जयशंकर ने भी 'रीपोजिशनिंग' शब्द का इस्तेमाल किया था और अमेरिका को एक 'अकेली पड़ती ताकत' बताया था।

उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका अपने गठबंधन साझेदारों के साथ भी अपनी स्थिति बदल रहा है। हम अमेरिका के रणनीतिक साझेदार हैं लेकिन हाल में उस रणनीतिक साझेदारी में भी बहुत अच्छे दिन नहीं देखे गए हैं। जयशंकर ने जिस तरह से इन भावनाओं को व्यक्त किया, उससे ऐसा नहीं लगता कि उम्मीद के लिए बहुत कुछ बचा है।

दीपक भोजवानी ने कहा कि रूबियो मई के बाद दूसरी बार भारत आए हैं। जयशंकर के बहुत स्पष्ट बयानों के बाद उनका ये दौरा हो रहा है कि हम इस रिश्ते को कैसे देखते हैं। अमेरिका इस समय इस बात को लेकर थोड़ा अधिक सतर्क है कि वह भारत को सार्वजनिक रूप से आड़े हाथों न ले।

'अमेरिका के दावे को कोई अब गंभीरता से नहीं लेता'

भोजवानी ने कहा कि अमेरिका जितना जोर-शोर से दावा करता है कि रिश्ता बहुत मजबूत है, यह सबसे रणनीतिक संबंधों में से एक है, सबसे बेहतरीन है, वगैरह-वगैरह, लेकिन असल में देखा जाए तो कोई भी वास्तव में इसे गंभीरता से नहीं लेता है। कम से कम नीति विश्लेषण समुदाय और कूटनीतिक समुदाय में तो कोई नहीं लेता। ऐसे में रूबियो शायद यह बात समझकर मुंबई आए हैं कि बड़े व्यापारिक घरानों की अमेरिका में हमेशा रुचि रहेगी, और ऐसा है भी।

भोजवानी कहते हैं कि अमेरिका की नजरें रिलायंस पर हैं क्योंकि वह वेनेजुएला से कच्चे तेल के बड़े आयातकों में से एक थी। 2013 की शुरुआत में भी रिलायंस ने वेनेजुएला से प्रतिदिन एक मिलियन बैरल से अधिक का आयात किया था। लैटिन अमेरिका में कच्चे तेल की वजह से वेनेजुएला हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। अब इस साल की शुरुआत में वाशिंगटन द्वारा प्रतिबंध हटाए जाने के बाद रिलायंस ने फिर से कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया है, क्योंकि उन्होंने वेनेजुएला को एक तरह से अपना उपनिवेश बना लिया है।

क्या अमेरिका भारत से ट्रेड डील करने को तैयार है?

इस सवाल पर दीपक भोजवानी ने कहा कि भारत अमेरिका का मजबूत रणनीतिक साझेदार है। हम बहुत, बहुत करीब हैं। मैं कहूंगा कि बिना किसी लिखित समझौते के हम जितने करीब हो सकते हैं, उतने करीब हैं। अब बहुत कम चीजें बची हैं, इसलिए उम्मीद है कि यह डील जल्दी हो जाएगी, और ऐसा होना भी चाहिए। उम्मीद है कि बहुत जल्द घोषणा हो सकती है। हम आशा कर सकते हैं कि हमारे पास जल्द ही कुछ ठोस रूप में होगा।

बता दें कि मुंबई में एक कार्यक्रम में मार्को रूबियो ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में बस कुछ ही वक्त बाकी है। उन्होंने संकेतों में कहा कि डील को कुछ महीने नहीं बल्कि कुछ हफ्तों में अंतिम रूप दिया जा सकता है। रूबियो का कहना था कि डील लगभग पूरी हो चुकी है और अब केवल कुछ छोटी-मोटी तकनीकी बारीकियों पर काम चल रहा है। 

जामनगर रिफाइनरी पर इतना जोर क्यों? 

रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी की क्षमता 7 करोड़ टन साल की है। दुनिया की कई रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को रिफाइन नहीं कर सकती हैं, इसलिए अमेरिका रिलायंस को अनुमति दे सकता है कि वह वेनेजुएला का कच्चा तेल अधिक आयात करे। साथ ही रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को कम किया जाए।

भोजवानी कहते हैं कि उन्होंने डंडे (प्रतिबंधों) का इस्तेमाल करके देख लिया है। हम सब जानते हैं कि ट्रंप ने लिंडसे ग्राहम एक्ट के रूप में प्रतिबंधों को रोक रखा है, जो रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ का अधिकार देता है। मुझे लगता है कि भारत की स्थिति कम से कम बयानों के स्तर पर काफी स्पष्ट रही है कि हम वहीं से कच्चा तेल खरीदेंगे जहां यह सबसे सस्ता मिलेगा।

उन्होंने कहा कि भारत के पास नायरा (Nayara) जैसी रिफाइनरियां भी हैं, जो जामनगर रिफाइनरी के पास ही एक बड़ी रिफाइनरी है जिसमें रूसी कंपनी की हिस्सेदारी रही है। भारत के सामने ऐसी स्थिति है, जहां अमेरिका यह देखने की कोशिश कर रहा है कि क्या वह खुले तौर पर भारत को चुनौती दिए बिना रूसी तेल को भारत आने से रोक सकता है और वेनेजुएला से इंपोर्ट बढ़ा सकता है। ध्यान देने की बात ये है कि वेनेजुएला से बेचा जाने वाला सारा कच्चा तेल अमेरिका के खाते में जाता है, वेनेजुएला सरकार के खाते में नहीं। ऐसे में यह अमेरिका के हितों के ज्यादा अनुकूल है।

अमेरिका ने क्या भारत की स्थिति का गलत आकलन किया?

इस सवाल के जवाब में पूर्व राजदूत भोजवानी कहते हैं कि मुझे लगता है कि वाशिंगटन लंबे समय से भारत को लेकर गलत आकलन करता रहा है। फिर उन्होंने अपना रुख बदला है। वे वापस आए हैं। इसी तरह की चीजें चलती रही हैं। रोनाल्ड रीगन का कार्यकाल भी एक आपदा था। रिचर्ड निक्सन, उससे भी बदतर, जब उन्होंने हमें धमकी दी थी। जब किसिंजर पाकिस्तान गए और फिर वहां से चीन गए और वहां संबंध शुरू किए। फिर जब 1971 में हमारे सामने बांग्लादेश का संकट आया, तो उन्होंने बंगाल की खाड़ी में अपना सातवां बेड़ा भेज दिया।

फिर रीगन आए, जिन्होंने भारत पर भारी प्रतिबंध लगाए या लगाने की धमकी दी, जो वास्तव में पूरी तरह से काम नहीं कर पाए। इसके बाद जॉर्ज बुश आए, जिन्होंने महसूस किया कि, देखिए हम भारत को ब्लैकमेल नहीं कर सकते इसलिए उनके साथ मिलकर काम करें। तब तक भारत की सुधार प्रक्रिया जोर पकड़ चुकी थी। अमेरिका की नजर में भी वह रणनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण देश बन चुका था।

'जब समझ गए कि भारत नहीं झुकेगा तो सौदे पर आ गए'

भोजवानी ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ज्यादा कुछ नहीं किया। मगर दूसरे कार्यकाल में वह ताकत के बारे में ज्यादा सोचते हैं कि भारत क्या हासिल कर सकता है? अमेरिका क्या चाहता है और क्या हासिल कर सकता है? चीन क्या हासिल कर सकता है? रूस क्या हासिल कर सकता है? उसी के अनुसार, वह समीकरणों की गणना करते हैं और कहते हैं, देखिए, हम रूस को यूक्रेन पर पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। तो आइए उन्हें रियायतें दें या जो भी हो।

चीन के साथ भी यही बात है। अमेरिका चीन को पीछे नहीं हटा सकता, इसलिए उनके साथ सौदे करने जा रहा है। अब भारत को धमकी देने के बाद और यह महसूस करने के बाद कि भारत झुकने वाला नहीं है, चाहे वह व्यापार समझौता हो या रूसी आयात या कुछ और हो, उन्होंने अब अपने दूत को भेजा है। रूबियो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं। उन्हें यह देखने के लिए भेजा गया है कि वह भारतीय व्यापार को लेकर क्या कर सकते हैं। 

भोजवानी ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि रूबियो बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं। वह शायद रिलायंस को थोड़ा और आयात करने के लिए मना सकते हैं। रिलायंस के टेक्सास में निवेश की खबर भी आ सकती है। टेक्सास में एक रिफाइनरी में 20 अरब डॉलर के निवेश की योजना है और इस तरह की चीजें, जिन्हें ट्रंप  अपने फायदे के लिए दिखा सकते हैं, लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं।