ट्रंप को अपने मिनिस्टर रूबियो को जामनगर क्यों भेजना पड़ा?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो मुंबई पहुंचे हैं, लेकिन सबकी नजरें उनके जामनगर दौरे पर है, जहां वे रिलायंस की विशाल रिफाइनरी देखने और मुकेश अंबानी से मिलने जा सकते हैं। दुनिया में खासतौर से अमेरिका डीजल की किल्लत, बढ़ती ईंधन कीमतों और भारत-अमेरिका की ट्रेड डील के बीच उनका यह दौरा अहम माना जा रहा है।

'भारत रिफाइनिंग के क्षेत्र में एक सुपरपावर है...'

इस एक लाइन के स्टेटमेंट से अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने मुंबई में अपने जामनगर जाने की वजह बता दी। खुद को हर क्षेत्र में सुपरपावर मानने वाले अमेरिका के टॉप मिनिस्टर का यह कहना अपने आपमें बड़ा मैसेज और ट्रंप प्रशासन की मजबूरी को दिखाता है। इससे साफ है कि अमेरिका के लिए भारत की रिफाइनिंग ताकत कितनी जरूरी है। रूबियो बुधवार को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस की विशाल तेल रिफाइनरी जाएंगे, जहां वह रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी से मिलेंगे।

दरअसल, वेनेजुएला के तेल पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में रूबियो ने कहा, 'भारत तेल खरीद सकता है। इस पर हम कल (21 अक्टूबर को) बात करेंगे। तेल रिफाइनिंग की क्षमता इस चर्चा का एक बड़ा हिस्सा है। भारत रिफाइनिंग के क्षेत्र में एक सुपरपावर है।'

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भारत में एक ऐसी कंपनी है, जिसके पास तेल रिफाइनिंग की बहुत बड़ी क्षमता है... मैं यहां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के तौर पर भी आया हूं, क्योंकि ऊर्जा भी राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अहम मुद्दा है।
मार्को रूबियो
मार्को रूबियो
अमेरिका के विदेश मंत्री

उनके जामनगर दौरे की चर्चा है कि आखिर अमेरिका के बड़े मिनिस्टर को भारत की एक रिफाइनरी में इतनी दिलचस्पी क्यों है? इसकी वजह सिर्फ तेल नहीं, बल्कि डीजल की किल्लत, अमेरिका में बढ़ती ईंधन कीमतें और भारत-अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड डील भी है।

जामनगर ही क्यों? समझिए दुनिया के डीजल बाजार का कनेक्शन

जामनगर की रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा एक ही जगह पर बना रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है, जहां रोजाना करीब 14 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है। यहां कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं, जिन्हें भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में भेजा जाता है।

अब असली पेच समझिए। 

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और रूस से डीजल की सप्लाई में आई रुकावटों ने दुनिया के ईंधन बाजार पर दबाव बढ़ा दिया था। इसका असर अमेरिका तक पहुंचा है।

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 6.29 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भी चेतावनी दी है कि डीजल की वैश्विक किल्लत 2027 तक बनी रह सकती है।

ऐसे में अमेरिका की नजर भारत की उस रिफाइनरी पर है, जो बड़े पैमाने पर डीजल तैयार करके अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेज सकती है।

भारत का डीजल अमेरिका के लिए मददगार

रिलायंस ने वैश्विक बाजार में ईंधन की कमी के बीच अपना निर्यात काफी बढ़ाया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में जामनगर से यूरोप भेजे गए डीजल की मात्रा करीब 40 से 50 लाख बैरल तक पहुंच गई थी। यह पिछले 10 महीनों का सबसे ज्यादा था। इसी दौरान भारत से ब्राजील को भी डीजल की सप्लाई बढ़ी।

दुनिया के बाजार में भारत से डीजल की सप्लाई बढ़ती है, तो इससे डीजल की कीमतों को कम करने में मदद मिल सकती है। यही एक अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो को भारत खींच लाई है।

अब जामनगर का वेनेजुएला कनेक्शन समझिए

भारत की दूसरी कई रिफाइनरियों के मुकाबले जामनगर रिफाइनरी की खासियत यह है कि यहां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को भी प्रोसेस किया जा सकता है। जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनी Kpler के मुताबिक, अक्टूबर में भारत आने वाले वेनेजुएला के तेल की मात्रा बढ़कर करीब 4.65 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच सकती है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तेलों के टैंकर सिक्का बंदरगाह जाने के लिए रजिस्टर हुए हैं और यह बंदरगाह जामनगर रिफाइनरी के लिए काम करता है।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के ऊर्जा कारोबार को निशाना बनाने वाले नए कानून के कुछ अहम प्रतिबंधों और टैरिफ प्रावधानों में छूट दी है। इससे रिफाइनरियों के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना आसान हो सकता है।

रूबियो ने कहा है कि अमेरिका रूस के तेल पर और पाबंदियां लगाने के आर्थिक असर का आकलन कर रहा है। इसमें भारत जैसे देश भी शामिल हैं, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल पर निर्भर हैं।

ट्रंप का 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' वाला सपना

रूबियो और मुकेश अंबानी की मुलाकात के पीछे एक और बड़ा कारोबारी कनेक्शन है। रिलायंस अमेरिका के टेक्सस में प्रस्तावित एक नई रिफाइनरी प्रोजेक्ट से जुड़ी है। इस प्रोजेक्ट में अमेरिकी शेल ऑयल को प्रोसेस करने की योजना है।

प्रस्तावित रिफाइनरी की क्षमता करीब 1.68 लाख बैरल प्रतिदिन बताई गई है। रिलायंस ने इसके उत्पादन को 20 साल तक खरीदने का समझौता किया है। प्रोजेक्ट से जुड़े डेवलपर ने इसे पिछले 50 साल में अमेरिका की पहली नई रिफाइनरी बताया है।

यह प्रोजेक्ट ट्रंप की उस नीति से भी जुड़ी है, जिसके तहत वे अमेरिका में तेल और गैस का घरेलू उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं। उनकी इस मुहिम को 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' नारे से भी जाना जाता है। इसका मकसद अमेरिकी ऊर्जा उत्पादन बढ़ाकर वहां के उपभोक्ताओं तक इसके फायदे पहुंचाना है।

खरबपति बनाम अरबपति विवाद के बीच जामनगर जा रहे रूबियो

रूबियो की अंबानी से मुलाकात ऐसे वक्त हो रही है, जब दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में से एक, ट्रंप के करीबी एलन मस्क भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक शुरू करने में हो रही देरी से नाराज हैं। मस्क ने इस देरी के लिए अंबानी को भी जिम्मेदार ठहराया था और आरोप लगाया था कि भारत में कुछ बड़े कारोबारी स्टारलिंक के रास्ते में रुकावट डाल रहे हैं।

रिलायंस के टेलीकॉम बिजनेस जियो के भारत में 53 करोड़ से ज्यादा ग्राहक हैं। कंपनी ने बाजार में प्रतिस्पर्धा रोकने के आरोपों को खारिज किया है।

रिलायंस ने स्टारलिंक का स्वागत करते हुए कहा कि उसका अपना सैटेलाइट कारोबार भी भारत सरकार की सुरक्षा मंजूरी का इंतजार कर रहा है। भारत सरकार ने भी कहा है कि मंजूरी देने की प्रक्रिया में घरेलू कंपनियों को कोई खास तरजीह नहीं दी जा रही। बाद में मस्क ने रिलायंस के जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'बहुत आभार।'

इन विवादों के बीच रूबियो का रिलायंस की रिफाइनरी का दौरा करना दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन के लिए कारोबार और आर्थिक हित काफी अहम हैं। दुनिया में ऊर्जा की बदलती जरूरतें और अंबानी जैसे बड़े कारोबारी भारत-अमेरिका के रिश्तों में अहम भूमिका निभा सकते हैं।