अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो भारत दौरे पर आ रहे हैं। पहले वह उज्बेकिस्तान जाएंगे, उसके बाद भारत आएंगे। उनकी 20 अक्टूबर को विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात का कार्यक्रम है। वह मुंबई और गुजरात के जामनगर भी जाएंगे। दौरे पर निकलने से पहले उन्होंने बताया कि इस यात्रा का मकसद क्या है।
अमेरिकी विदेश मंत्री का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले भारत जैसे देशों पर नए टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल टाल दी है। रूबियो ने दौरे पर निकलने से पहले बताया कि ये प्रतिबंध हटाने के पीछे अमेरिका की सोच क्या है? उनका ये दौरा भारत-अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौते को लेकर भी अहम है, जिसकी बातचीत लंबे समय से अटकी हुई है।
भारत दौरे का मकसद क्या है?
अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, रूबियो भारतीय अधिकारियों के साथ पार्टनरशिप बढ़ाने समेत दुनिया के ताजा हालात पर चर्चा करेंगे। रवाना होने से पहले रूबियो ने कहा, 'मैं अभी उज्बेकिस्तान और भारत के दौरे पर निकला हूं, ताकि ट्रंप प्रशासन अमेरिका के लिए आर्थिक अवसर जुटाने की अपनी कोशिशें जारी रख सके।'
उनके इस बयान का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि भारत-अमेरिका संबंधों में इस समय तीन बड़े मुद्दे एक साथ खड़े हो गए हैं- रूस से तेल खरीद, भारत-अमेरिका ट्रेड डील और अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के बाजार में कारोबारी अवसर।
रूसी प्रतिबंधों पर रोक में 60 दिन का पेच
रूबियो के भारत दौरे से ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट के तहत प्रस्तावित प्रतिबंधों और टैरिफ को लागू करने पर रोक लगा दी। यह कानून रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। भारत और चीन इससे सबसे ज्यादा रिस्क में थे। इसके अलावा रूसी वस्तुओं पर 500 फीसदी टैरिफ का भी इस कानून में प्रावधान है।
इस कानून पर रोक लगाने के फैसले से भारत पर संकट फिलहाल टल गया है। रूबियो ने ट्रंप प्रशासन के इस फैसले पर कहा कि प्रस्तावित प्रतिबंधों का असर सिर्फ रूस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत जैसे देशों पर भी पड़ता।
उन्होंने कहा, 'ये प्रतिबंध सिर्फ रूस पर नहीं थे। इनमें भारत जैसे कई देशों पर टैरिफ लगाने का प्रावधान भी शामिल था। इसलिए राष्ट्रपति 60 दिनों की अवधि में यह देखना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ को लागू करने का दुनिया की अर्थव्यवस्था और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।'
भारत की ऊर्जा जरूरतों का जिक्र करते हुए रूबियो ने कहा कि देश ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन रूस से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति को अचानक एक दिन में बदलना आसान नहीं है।
रूबियो ने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई पर दबाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़ा संघर्ष, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनाव, सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा ढांचे पर हो रहे हमले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर असर डाल रहे हैं।
इस फैसले से भारत को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन इसे स्थायी छूट नहीं माना जा सकता। रूबियो ने खुद 60 दिनों की समीक्षा की बात कही है। यानी अमेरिकी प्रशासन आगे यह तय कर सकता है कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ किस तरह के प्रतिबंध या शुल्क लागू किए जाएं।
रूसी तेल अमेरिका की मजबूरी
रूस से अमेरिकी डीजल खरीदने के समझौते पर उठ रहे सवालों के बीच रूबियो ने कहा कि रूस का डीजल किसी न किसी रूप में वैश्विक बाजार में बिकता। उनके मुताबिक, फर्क यह था कि उस आपूर्ति का कितना हिस्सा अमेरिका को मिलता। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों का असर अब तेल-गैस की कीमतों और अर्थव्यवस्थाओं पर एक साथ पड़ रहा है।
रूबियो का यह बयान ऐसे समय आया है, जब रूस पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले की अमेरिका में कई सांसद आलोचना कर रहे हैं। इनमें कुछ रिपब्लिकन सांसद भी शामिल हैं।
रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने इसे रूस के सामने अमेरिका के झुकने से तुलना करते हुए कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है। रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट ने रूस पर आर्थिक दबाव के लिए हरसंभव कोशिश करने पर जोर दिया।
डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने ट्रंप पर कांग्रेस की अनदेखी करने और रूस की मदद का आरोप लगाया। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने कहा कि इससे रूस की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।
हालांकि ट्रंप प्रशासन की दलील इनसे अलग है। रूबियो का कहना है कि प्रतिबंधों और टैरिफ का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब तेल-गैस की कीमतें बढ़ी हुई हैं और ग्लोबल सप्लाई पर कई मोर्चों से दबाव है।
रूबियो के भारत दौरे में ट्रेड डील पर बात बनेगी?
रूबियो के भारत दौरे में दोनों देशों के बीच संभावित व्यापार समझौते पर भी नजर रहेगी। दोनों देश फरवरी में एक व्यापार समझौते के शुरुआती ढांचे पर सहमत हुए थे। इसके बाद अमेरिका ने भारतीय सामान पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया। हालांकि इसे घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया था, लेकिन तनाव और अंतिम समझौते को लेकर बातचीत में कई अड़चनें बनी हुई हैं।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर ने संकेत दिया था कि समझौता तत्काल होने वाला नहीं है। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी ट्रेड डील पर बातचीत को एक ऐसे पड़ाव पर बताया था, जहां आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित हो गई है।
अमेरिका में भारत के राजदूत सर्जियो गोर ने भी हाल में कहा था कि डील को लेकर बड़े मुद्दे सुलझा लिए गए हैं और बातचीत आगे बढ़ रही है। लेकिन भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भारतीय निर्यातकों को अन्य देशों के मुकाबले बेहतर मार्केट एक्सेस और टैरिफ संबंधी स्थिरता मिलनी चाहिए।
भारत क्या चाहता है?
- खेती और डेयरी को सुरक्षा: भारत चाहता है कि अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय कृषि और डेयरी बाजार पूरी तरह न खोला जाए, ताकि देश के किसानों और कारोबारियों के हित सुरक्षित रहें।
- कृषि उत्पादों को छूट से बाहर रखना: भारत की मांग है कि दूध और डेयरी उत्पाद, चिकन, चावल, गेहूं और दूसरी अहम फसलों को बाजार खोलने से जुड़ी रियायतों से बाहर रखा जाए। इससे सस्ते अमेरिकी उत्पादों के कारण भारतीय किसानों को होने वाले संभावित नुकसान से बचाया जा सकेगा।
- भारतीय निर्यातकों को बराबरी का मौका: भारत चाहता है कि ट्रेड डील की शर्तें ऐसी हों, जिससे भारतीय कंपनियों को वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों के मुकाबले नुकसान न हो और उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बराबरी का मौका मिले।
भारत की पूर्व राजनयिक वीणा सीकरी के मुताबिक, रूबियो के दौरे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखना होगा कि दोनों देश किन मुद्दों पर बातचीत करते हैं और व्यापार समझौते में भारत को किस तरह की शर्तें मिलती हैं।
उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, 'मुझे लगता है कि अमेरिका के साथ किन मुद्दों पर चर्चा हो रही है, यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।'
सीकरी ने रूस से तेल खरीद पर टैरिफ में छूट और ट्रंप के रूस के साथ डीजल समझौते को अमेरिका के मिडटर्म चुनाव से जोड़ा है।
उन्होंने कहा कि ट्रंप को उम्मीद है कि रूस से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदने से अमेरिका में चुनाव से पहले ईंधन की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी।