वो साल था 1894 और 24 साल का एक युवक कलकत्ता (आज का कोलकाता) से ब्रिटिश जहाज से सूरीनाम के लिए रवाना हुआ था। वो यात्रा नहीं, हमेशा के लिए अपनी माटी से दूर जाने का प्रस्थान था। 132 साल बाद वह तो नहीं रहे, लेकिन उनका परिवार सूरीनाम से लौटा है। अपनी जड़ों को ढूंढ़ता हुआ, भावुक मन से... पुरखों की यादों को समेटे।
यूपी में गाजीपुर के उस गांव में पीढ़ियां गुजर गईं। आज उसे कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता लेकिन ये माटी उसे अपनी-सी लगती है। अब इस परिवार को लगता है कि गाजीपुर से सूरीनाम का वो सफर अब जाकर पूरा हो रहा है।
सूरीनाम से गाजीपुर पहुंचे इस परिवार की यह 'चौथी पीढ़ी' है। ये सिर्फ एक परिवार का लौटना नहीं, बल्कि उस गिरमिटिया इतिहास की घर वापसी जैसा है, जो सवा सौ साल पहले आंसुओं के साथ लिखा गया था। तब रोजी-रोटी के लिए मजबूरी में देश छोड़कर जाना पड़ा था। अंग्रेज खेती कराने ऐसे बहुत से लोगों को यूपी-बिहार से लेकर गए थे।
सूरीनाम में रहने वाले जॉन मोहनलाल रामनंदनलाल और शारदा रामनंदनलाल ने अपने 70 साल के पिता की तमन्ना पूरी करने के लिए गाजीपुर के खानपुर गांव और वाराणसी घूमे।
परिवार ने अपने वंश की वैज्ञानिक पुष्टि करने और पूर्वजों का पता लगाने के लिए 'ज्ञान लैब' में प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे को DNA सैंपल भी दिए। ऐतिहासिक दस्तावेजों और रिसर्च रिपोर्टों के अनुसार, परिवार के पूर्वज रामानंदन और उनकी पत्नी राजवंतिया, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में सैदपुर पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले खानपुर गांव के निवासी थे।
तब 89 दिन में पहुंचे थे सूरीनाम
उस समय रामनंदन की उम्र 24 साल थी। उनके पिता का नाम होरोपुरसाद (हरि प्रसाद) था। राजवंतिया की उम्र 22 साल थी। उनके पिता का नाम बरम चरीलाल था। यह जोड़ा कायस्थ समुदाय से ताल्लुक रखता था। 25 अगस्त 1894 को, वे 'एम्स' (Ames) नाम के एक ब्रिटिश जहाज से अनुबंधित मजदूरों के रूप में कलकत्ता से सूरीनाम (पैरामारिबो) के लिए रवाना हुए। जहाज पर लगभग 400 यात्री सवार थे।
89 दिनों की लंबी और कठिन समुद्री यात्रा के बाद, वे 22 नवंबर 1894 को पैरामारिबो पहुंचे। वहां उन्हें निकेरी जिले के 'वाटरलू' बागान में काम पर लगा दिया गया। सूरीनाम में बसने और अपना अनुबंध पूरा करने के बाद, रामनंदन और राजवंतिया ने 20 दिसंबर 1911 को आधिकारिक तौर पर शादी कर ली।
इतिहास में दर्ज है कि उनके बेटे, जयकरम ने 15 अक्टूबर 1934 को आधिकारिक तौर पर 'रामनंदनलाल' उपनाम अपना लिया। यही उपनाम आज की पीढ़ी तक चला आ रहा है।
जड़ों की तलाश
सूरीनाम में बसे इस परिवार को अपने पूर्वजों के बारे में बहुत कम जानकारी थी। उन्हें यह नहीं पता था कि अपनी जड़ों का पता लगाने की शुरुआत कहां से करें। 70 साल के बुजुर्ग की दिली इच्छा थी कि वे अपनी आंखों से अपने पूर्वजों की जमीन देख लें, उसे चूम लें, माथे से लगा लें।
डॉ. पवन और दूसरे लोगों की मदद से, यह परिवार बनारस आया। स्थानीय लोगों से मिलने के लिए गाजीपुर के खानपुर गांव गया। अब, 'ज्ञान लैब' को सौंपे गए DNA टेस्ट के नतीजों के आधार पर, परिवार को उम्मीद है कि वे पूर्वी उत्तर प्रदेश और गाजीपुर में अपने भारतीय रिश्तेदारों को ढूंढ़ पाएंगे। इसके साथ ही वैज्ञानिक तरीके से अपनी पैतृक जड़ों की पुष्टि कर सकेंगे।