"हमें डेटा नहीं, पानी चाहिए", भारत में बन रहे गूगल के नए AI डेटा सेंटर का क्यों हो रहा है विरोध?

भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में गूगल के नए एआई डेटा सेंटर का विरोध हो रहा है। जमीन अधिग्रहण के साथ निर्माण शुरू है पर स्थानीय लोग खिलाफ हैं। आइए जानते हैं क्यों?

AI को भविष्य में किस तरह रेगुलेट किया जाएगा, इस पर फैसला लिया गया है और अगले महीने एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा...

8 अक्टूबर को जब दिल्ली में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव एआई के रेगुलेशन को लेकर देश के सामने सरकार के आगे के प्लान पर बात कर रहे थे तो देश के दक्षिणी छोर पर इसी से जुड़े एक डेटा सेंटर के निर्माण को लेकर विरोध तेज हो रहा था। जगह है विशाखापत्तनम का छोटा सा गांव तरलुवाड़ा।

कुछ महीनों पहले जो AI आम इंसान की रोजमर्रा का साथी बन गया था फिर चाहे ट्रांसलेशन कराना हो, किसी टॉपिक पर रिसर्च कराना, रिएलिस्टिक तस्वीरें बनवाना सहित और भी बहुत सारे काम। अब वही गले की फांस बन रहा है। दिग्गज टेक कंपनियों के मालिक ही इसे खतरनाक बता रहे हैं।

लेकिन, विशाखापत्तनम के तरलुवाड़ा गांव में किस चीज का विरोध हो रहा है? वजह है गूगल के नए AI डेटा सेंटर का निर्माण। वहां के स्थानीय लोग इस डेटा सेंटर को नहीं बनने देना चाहते। वजहों में पर्यावरण संबंधी समस्याओं के साथ वन्यजीव भी हैं। विशाखापट्टनम और उसके आसपास गूगल के इस हाइपरस्केल AI डेटा सेंटर हब के लिए कुल 601.40 एकड़ जमीन आवंटित की गई है। गूगल को अपने नए डेटा सेंटर को लेकर विरोध झेलना कोई नई बात नहीं है। चिली, उरुग्वे से लेकर अमेरिका तक में इसका विरोध हो चुका है, हालांकि वजहें अलग-अलग रही हैं।

तो आइए बताते हैं विशाखापत्तनम में क्यों AI डेटा सेंटर बनने का विरोध हो रहा है?

पहले पूरी कहानी समझिए

दरअसल, आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम के तरलुवाड़ा गांव में गूगल 15 अरब डॉलर की लागत से नया एआई डेटा सेंटर बना रहा है। आंध्र प्रदेश सरकार और गूगल ने अडानीकॉनैक्स (AdaniConneX) व एयरटेल के साथ साझेदारी में विशाखापट्टनम में भारत का सबसे बड़ा हाइपरस्केल AI डेटा सेंटर और सबसी केबल गेटवे स्थापित करने की योजना शुरू की है। इसका शिलान्यास राज्य को देश का बड़ा टेक हब बनाने के विजन के तहत किया गया है।

यहां तक तो ठीक है। असल दिक्कत अब शुरू होती है। तरलुवाड़ा गांव में स्थानीय लोगों जिनमें ज्यादातर किसान हैं, उन्हें इस निर्माण से आपत्ति है। उनका कहना है-

विशाखापट्टनम और आसपास का तटीय क्षेत्र पहले से ही जल दबाव (Hydrological stress) का सामना कर रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि डेटा सेंटर के विशाल कूलिंग सिस्टम के लिए लाखों लीटर पानी खींचने से आम जनता के लिए पीने के पानी की गंभीर किल्लत हो जाएगी। प्रदर्शनों में लोग 'डेटा नहीं पी सकते' जैसे पोस्टर देखे गए हैं।

AI सुपरकंप्यूटिंग के लिए गीगावाट-स्तर की भारी बिजली चाहिए, जिससे स्थानीय घरेलू और औद्योगिक बिजली दरों व आपूर्ति पर असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है।

तटीय और वन्यजीव क्षेत्रों के करीब इतनी भारी कंक्रीट संरचनाओं और औद्योगिक कचरे से समुद्र व स्थानीय इकोसिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है।

शांतिपूर्ण धरनों को रोके जाने और अभियान से जुड़े कुछ सोशल मीडिया पेजों पर पाबंदी लगाए जाने के बाद कार्यकर्ताओं ने इसे आवाज दबाने का प्रयास करार दिया। अब यह मामला अदालती याचिकाओं तक भी पहुंच चुका है।


गूगल के इस प्रोजेक्ट के तहत विशाखापट्टनम के आसपास वास्तव में तीन अलग-अलग डेटा सेंटर बनाए जाएंगे। तरलुवाड़ा के पास स्थित एक अन्य साइट तो एक आरक्षित वन (रिजर्व फॉरेस्ट), पीने के पानी के जलाशय और तेंदुओं जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों के घर माने जाने वाले वन्यजीव अभयारण्य से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर है।

आरोप है कि इस AI डेटा सेंटर के इतने बड़े दायरे के बावजूद, राज्य सरकार ने बिना किसी जनसुनवाई (पब्लिक कंसल्टेशन) के केवल नौ दिनों के भीतर गूगल को पर्यावरण संबंधी सभी मंजूरियां (एनवायरमेंट क्लीयरेंस) जारी कर दीं।

प्रोजेक्ट को इतनी जल्दबाजी में दी गई मंजूरी को चुनौती देते हुए अब देश की शीर्ष पर्यावरण अदालत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में तीन याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि पर्यावरण और पानी की आपूर्ति पर पड़ने वाले खतरों का सरकार की ओर से किया गया आकलन बेहद नाकाफी, वैज्ञानिक रूप से अवास्तविक और भ्रामक था। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है।

एनजीटी में मामले दर्ज कराने वाले संगठन 'ह्यूमन राइट्स फोरम' के कार्यकर्ता वी.एस. कृष्णा ने कहा,

“यह डेटा सेंटर अपने पैमाने में अभूतपूर्व होगा, लेकिन इसके लिए न तो कोई जनसुनवाई की गई और न ही स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले इकोलॉजिकल नुकसान या आर्थिक बोझ का कोई ठोस मूल्यांकन किया गया।”

कृष्णा ने मीडिया चैनल्स से बातचीत में आरोप लगाया कि डेटा सेंटर के खिलाफ उनके विरोध अभियान को जानबूझकर दबाने और चुप कराने की कोशिश की गई है, जिसमें उनके वीडियो और सोशल मीडिया पेजों को हटाना (टेक डाउन करना) शामिल है। सरकार ने इस आरोप पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

कृष्णा ने आगे कहा,

“यह समझने के लिए कि यह पर्यावरण के लिहाज से कितना विनाशकारी होगा, हमें बस दुनिया भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को देखने की जरूरत है।”

तरलुवाड़ा का तापमान कैसा रहता है?

तरलुवाड़ा में गर्मियों के दौरान तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच जाता है। यह चिंता बनी हुई है कि डेटा सेंटर जो बड़े पैमाने पर गर्मी (हीट) उत्सर्जित करने के लिए जाने जाते हैं स्थिति को और बदतर बना सकते हैं। इस परियोजना के लिए 100 एकड़ से अधिक जमीन पर जंगलों की भारी कटाई तापमान को और ज्यादा बढ़ा सकती है।

गूगल का इस विरोध पर क्या कहना है?

स्थानीय लोगों के विरोध पर गूगल का जवाब भी आ गया है। गूगल ने पानी की खपत पर कहा कि उसने निर्माण से पहले ही स्थानीय वाटरशेड (जल स्रोतों) पर दबाव का आकलन कर लिया था। इसी वजह से विशाखापट्टनम हब में पारंपरिक पानी आधारित कूलिंग सिस्टम की जगह एडवांस्ड एयर-कूलिंग (हवा से ठंडा करने वाली तकनीक) इस्तेमाल करने का फैसला लिया गया है।

कंपनी के अनुसार ऑफिस, मेंटेनेंस आदि में इस्तेमाल होने वाले पानी का 120% हिस्सा 2030 तक स्थानीय जल स्रोतों में वापस लौटाया जाएगा। गूगल ने डेटा सेंटर की इमारतों पर रेनवाटर हार्वेस्टिंग, ग्राउंडवाटर रिचार्ज और स्थानीय समुदाय के लिए वाटर एटीएम व पंपिंग सिस्टम लगाने की योजना की बात कही है।

स्थानीय ग्रिड पर अतिरिक्त बोझ के आरोप पर कंपनी का कहना है कि डेटा सेंटर चलाने के लिए आवश्यक नए सब-स्टेशनों और ट्रांसमिशन लाइनों का पूरा बुनियादी ढांचा गूगल खुद फंड करेगा। कंपनी ने दावा किया है कि वह 1 गीगावाट (GW) की इस सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रही है ताकि पारंपरिक बिजली आपूर्ति बाधित न हो।

ध्वनि और पर्यावरण प्रभाव पर 24/7 चलने वाले विशाल कूलिंग इक्विपमेंट से होने वाले ध्वनि प्रदूषण के आरोपों पर गूगल का कहना है कि वह सेंटर में साउंड डैम्पनिंग (ध्वनि-रोधी) तकनीकों का उपयोग कर रहा है ताकि आसपास की आबादी और जीव-जंतुओं पर असर न पड़े। कंपनी का दावा है कि उसके प्रोजेक्ट्स अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय मानकों और स्थानीय नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं।

नौकरियों की कमी के आरोप पर गूगल का कहना है कि यह केवल एक अकेला डेटा सेंटर नहीं, बल्कि एक पूरा AI इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम (सबसी केबल हब, डेटा पार्क और लॉजिस्टिक्स) है। कंपनी के मुताबिक इसके 3 से 5 साल के निर्माण चरण के दौरान हर साल औसतन लगभग 4200 निर्माण श्रमिकों को रोजगार मिलेगा, जिसके बाद ऑपरेशनल और सपोर्ट रोल्स भी तैयार होंगे।

सरकार ने क्या बताया?

आंध्र प्रदेश सरकार का कहना है कि यह निवेश राज्य की अर्थव्यवस्था, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को बड़े पैमाने पर गति देगा। प्रशासन ने पर्यावरण संबंधी कई दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है। सरकार और राज्य के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने विधानसभा में स्पष्ट किया, 

सरकार का कहना है कि डेटा सेंटर के लिए पानी टिकाऊ स्रोतों (sustainable sources), रीसाइकिल्ड पानी और डीसेलिनेशन/आरओ प्रोजेक्ट्स से उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे शहर की मौजूदा पेयजल आपूर्ति पर शून्य प्रभाव पड़ेगा। सरकार ने ग्रिड फेल होने या आम लोगों की बिजली दरों में बढ़ोतरी की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि इस प्रोजेक्ट की कम से कम 70% बिजली की मांग नवीकरणीय स्रोतों (सोलर और विंड एनर्जी) से पूरी की जाएगी।

AI डेटा सेंटर पर्यावरण के खिलाफ कैसे हैं?

गूगल के AI डेटा सेंटर का और कहां-कहां विरोध हुआ?

गूगल के एआई डेटा सेंटर बनने का विरोध सिर्फ भारत में नहीं हो रहा है बल्कि दुनिया के और भी देशों में विरोध हुए हैं।


1. चिली (लैटिन अमेरिका) 
चिली की राजधानी सैंटियागो (सेरिलोस) में गूगल के 200 मिलियन डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध किया था। वजह थी कि चिली लंबे समय से सूखे का सामना कर रहा है और इस प्रोजेक्ट में प्रतिदिन लाखों लीटर ग्राउंडवाटर खींचने की योजना थी। पर्यावरण कार्यकर्ताओं की कानूनी लड़ाई के बाद चिली की पर्यावरण अदालत ने मंजूरी पलट दी, जिसके बाद गूगल को पानी से ठंडा करने वाले पारंपरिक मॉडल को छोड़कर एयर-कूलिंग तकनीक पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। विरोध व अदालती आदेश के बाद गूगल को अपने पूरे प्रोजेक्ट को पूरी तरह बदलना पड़ा।

2. उरुग्वे 
उरुग्वे के मोंटेवीडियो के पास गूगल के प्रस्तावित डेटा सेंटर के खिलाफ सड़कों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। उरुग्वे में जब पेयजल की भारी किल्लत और इमरजेंसी जैसी स्थिति थी, तब यह खुलासा हुआ कि गूगल का सेंटर हर दिन लाखों लीटर पानी इस्तेमाल करेगा। लोगों ने “यह सूखा नहीं, लूट है” (No es sequía, es saqueo) के नारों के साथ आंदोलन किया, जिसके बाद गूगल को अपने प्रोजेक्ट का आकार घटाना पड़ा और वॉटर-कूलिंग का विचार छोड़ना पड़ा।

3. अमेरिका 
अमेरिका में ही कई राज्यों में AI इंफ्रास्ट्रक्चर के खिलाफ स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हो रहा है। ओरेगन में गूगल के डेटा सेंटर के शहर के कुल पानी का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करने की रिपोर्ट सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों ने कानूनी याचिकाएं दायर कीं। उत्तरी वर्जीनिया को “डेटा सेंटर कैपिटल” कहा जाता है। यहां बिजली की दरों में बढ़ोतरी, पावर ग्रिड पर दबाव, 24/7 चलने वाले कूलिंग फैंस से होने वाले ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) और जंगलों की कटाई को लेकर स्थानीय लोग नए सेंटरों का कड़ा विरोध कर रहे हैं।

4. आयरलैंड 
आयरलैंड में डेटा सेंटर्स देश की 20% से अधिक बिजली पहले ही खा रहे हैं। साउथ डबलिन काउंटी काउंसिल ने गूगल के नए डेटा सेंटर विस्तार के प्रस्ताव को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि देश का पावर ग्रिड इस अतिरिक्त भार को नहीं झेल पाएगा और इससे आयरलैंड के जलवायु लक्ष्य प्रभावित होंगे। आयरलैंड में नए ग्रिड कनेक्शनों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं।