भारत Vs UN: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन पर जवाबदेह ठहराने का हक किसे है?

दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों पर यूएन एजेंसी की टिप्पणी को भारत ने बेवजह बताते हुए अपने अंदरूनी मामलों में दखल करार दिया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। एक्सपर्ट्स भी संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं।

"शिकायतों के निपटारे के लिए हमारे देश में अदालतें हैं, OHCHR की चिंताएं बेवजह हैं और भारत के अंदरूनी मामलों में दखल स्वीकार नहीं किया जा सकता। अपने आसपास नजर दौड़ाएं, देखें कि वहां भी प्रोटेस्ट हो रहे हैं, उस पर भी ध्यान दें…"

दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन को लेकर ऑफिस ऑफ द यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स (OHCHR) की टिप्पणी पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है। भारत ने इन टिप्पणियों को बेवजह बताते हुए कहा कि शिकायतों के निपटारे के लिए देश में अदालतें हैं और भारत के अंदरूनी मामलों में दखल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हर लोकतंत्र की तरह भारत में भी लोगों को प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इसके साथ सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। मंत्रालय ने कहा कि भारत की कानून लागू करने वाली एजेंसियां कानून के मुताबिक काम करती हैं।

भारत ने पाकिस्तान और यूरोपीय देशों में हो रहे प्रदर्शनों का संदर्भ देते हुए संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय के रवैये पर सवाल उठाए। भारत के मुताबिक, दूसरे देशों में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों पर यूएन ऑफिस की चुप्पी उसके दोहरे रवैये को दिखाती है।

भारत के जिनेवा स्थित स्थायी मिशन ने भी यूएन ऑफिस की टिप्पणी को गलत बताया और इसे भारत के अंदरूनी मामलों में गैर-जरूरी दखल करार दिया है।

यूएन के ऑफिस ने दिल्ली प्रोटेस्ट पर क्या कहा?

10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उसके समर्थकों के प्रदर्शन से पहले और उसके दौरान कम से कम दो हजार लोगों को हिरासत में लिया गया।

पुलिस के मुताबिक, सुरक्षा के मद्देनजर प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी गई थी। इसके बावजूद भी जो लोग प्रदर्शन के लिए आ रहे थे और जंतर-मंतर की ओर जाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें डिटेन किया गया।

इसे लेकर OHCHR की तरफ से बयान आया। UN मानवाधिकार के प्रवक्ता थामीन अल-खीतान ने कहा कि प्रदर्शनकारियों, प्रदर्शन कर रहे नेताओं, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें चिंताजनक हैं।

बयान में UN ने उन सभी लोगों की 'तत्काल और बिना शर्त रिहाई' की मांग भी की, जिन्हें डिटेन किया गया था।

फ्रांस में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों पर यूएन ऑफिस की टिप्पणी

अब जरा हम स्कूलों और शिक्षा में सुधार को लेकर फ्रांस में चल रहे प्रदर्शनों पर नजर डाल लेते हैं। इसी शुक्रवार को फ्रांस के न्याय मंत्रालय ने जानकारी दी कि प्रदर्शनों की शुरुआत के बाद से अब तक 6,800 से ज्यादा लोगों को डिटेन किया गया है, जिनमें 86% छात्र नाबालिग हैं। ये प्रदर्शन कई बार हिंसक भी हुए हैं, जिनमें एक नाबालिग छात्र को अपने हाथ गंवाने पड़े।

बड़े पैमाने पर फ्रांस में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों पर यूएन मानवाधिकार एजेंसी की प्रवक्ता शाबिया मंटू ने प्रेस ब्रीफ में टिप्पणी की। उनकी टिप्पणी पढ़ लीजिए और उसकी भाषा पर गौर करिए-

उनकी टिप्पणी में कहीं भी डिटेन किए जा रहे लोगों को छोड़ने की बात नहीं थी, जबकि डिटेन किए गए अधिकतर छात्र नाबालिग हैं। भारत की बात करें तो, प्रदर्शन को रोकने की कार्रवाई शांतिपूर्ण तरीके से की गई और कहीं से भी हिंसा की कोई खबर नहीं आई।

OHCHR के दोहरे रवैये पर सवाल

इस बयान के आने के बाद से ही भारत में सवाल उठ रहे हैं कि एक संप्रभु देश के अंदरूनी मामलों में दखल देना क्या संयुक्त राष्ट्र के कानूनी अधिकार के तहत आता है?

द हिंदू के पूर्व स्ट्रैटेजिक अफेयर्स एडिटर और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट अतुल अनेजा ने RT हिंदी से बात करते हुए कहा कि भारत को यूएन के ऐसे बयानों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

Aneja
संयुक्त राष्ट्र के बयानों में पक्षपात और उसकी मंशा साफ नजर आती है। मुझे नहीं लगता कि भारत जैसे देश को इसकी इतनी परवाह करनी चाहिए। हालांकि, हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि अब पूरी ताकत से हमला शुरू हो चुका है और यह आगे और बढ़ेगा। बाहर की ताकतें यह तय नहीं करेंगी कि भारत की दिशा क्या होगी। भारत एक संप्रभु देश है।
अतुल अनेजा
अतुल अनेजा
वरिष्ठ पत्रकार और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट

भारत के पूर्व डिप्लोमैट कंवल सिब्बल ने भी यूएन ऑफिस की ओर से आए बयान की तीखी आलोचना की और कहा कि 'हमें संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाओं में सक्रिय भारत-विरोधी गुटों का डटकर मुकाबला करना चाहिए।'

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने आरोप लगाया, 'भारत को एक आसान टार्गेट के तौर पर देखा जाता है। भारतीय लोकतंत्र को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया जाता। हमारे देश के अंदर मौजूद विरोधी तत्व इन गुटों को जानकारी और समर्थन देते हैं।'

sibal
ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें दूसरों को उपदेश देना पसंद है। ये देशों के आंतरिक मामलों में दखल देते हैं। जिन देशों के बारे में इन्हें बहुत कम जानकारी होती है, वहां के हालात की जटिलताओं को भी ये ठीक से नहीं समझते। ये मीडिया की ऐसी खबरों पर भरोसा करते हैं, जो उनकी वैचारिक सोच और पूर्वाग्रहों के मुताबिक होती हैं।
कंवल सिब्बल
कंवल सिब्बल
भारत के पूर्व डिप्लोमैट

गुरुवार को यूएन में भारत के राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि अरिंदम बागची ने भी संस्था के दोहरे रवैये पर सवाल उठाए।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान बागची ने कहा, 'इंसानी जिंदगी के महत्व में कोई ऊंच-नीच नहीं होनी चाहिए। इंसानी गरिमा की रक्षा चुनिंदा तरीके से नहीं होनी चाहिए और न ही इस मामले में दोहरे मापदंड अपनाए जाने चाहिए। हमें इस बात का अफसोस है कि आतंकवाद के पीड़ितों के मानवाधिकारों पर साफ तौर पर ध्यान नहीं दिया गया।'

भारत को टारगेट किया जा रहा है?

अतुल अनेजा कहते हैं कि भारत को निशाना बनाया जा रहा है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं का इस्तेमाल हो रहा है, अमेरिका टैरिफ और सेकेंडरी प्रतिबंधों के जरिए भी भारत को टारगेट कर रहा है।

वो कहते हैं, 'इसके पीछे बाहरी ताकतें हैं, जिन्हें मैं डीप स्टेट कहता हूं। मैं अकेला ऐसा नहीं कहता, बल्कि आम तौर पर डीप स्टेट उन गैर-निर्वाचित संस्थाओं और ताकतों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो नहीं चाहतीं कि देश संप्रभु रहें और दुनिया में एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था बने, जिसमें संप्रभु देशों का प्रभाव कम हो जाए। इन ताकतों का फोकस इस वक्त दक्षिण एशिया पर है। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन हम देख ही चुके हैं।'

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डीप स्टेट अब भारत को टारगेट कर रहा है क्योंकि भारत इस क्षेत्र में सबसे बड़ी ताकत और एक लोकतांत्रिक देश है। इसके लिए देश को तैयार रहना चाहिए और मैं समझता हूं कि भारत इसका अच्छे से जवाब देगा।
अतुल अनेजा
अतुल अनेजा
वरिष्ठ पत्रकार और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट

वह कहते हैं कि पश्चिमी देशों का नियंत्रण सिर्फ दूसरे देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं पर भी उनका प्रभाव रहा है। अब भारत इस प्रभाव से बाहर निकल रहा है। ऐसे में भारत के खिलाफ एक व्यापक हमला शुरू हो गया है।

उन्होंने आगे कहा, 'हमें संयुक्त राष्ट्र के बयानों, अमेरिका की बदलती नीतियों और भारत को लेकर की जा रही टिप्पणियों के बीच संबंधों को समझना होगा। अगर हम पूरी तस्वीर देखें, तो भारत कई मोर्चों पर निशाने पर है। इस पूरे घटनाक्रम में संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं भी अहम भूमिका निभा रही हैं।'

संयुक्त राष्ट्र पर उठते सवाल

अतुल अनेजा संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि यह संस्था कोई लोकतांत्रिक संस्था नहीं है।

वह कहते हैं, 'मैं जिस ग्लोबल एलीट या डीप स्टेट की बात कर रहा हूं, वही लोग इन संस्थाओं में अपने लोगों को अहम पदों पर पहुंचाते हैं। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाएं हों या अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC)। इस लिहाज से देखें तो यूएन सिस्टम पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है।'

वह कहते हैं कि इसलिए संयुक्त राष्ट्र में आमूल-चूल सुधार बहुत जरूरी है। उनके मुताबिक, 'जब हम संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बात करते हैं, तो यह सुधार सिर्फ सुरक्षा परिषद के विस्तार तक सीमित नहीं होना चाहिए। अमेरिका और यूरोप पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते। संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं में बड़ी आबादी वाले देशों और क्षेत्रों को पूरी भागीदारी और प्रभाव मिलना चाहिए।'

अतुल अनेजा कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं में बदलाव से ही इस तरह के पक्षपात रुक पाएंगे।