भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियारों का खरीदार है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस साल भारत का पूरा फोकस नौसेना को बूस्ट देने पर है। रूस की मदद से फ्रिगेट प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। युद्धपोत, पनडुब्बी और दूसरे हथियारों की बड़ी डील इंडियन नेवी की ताकत में इजाफा कर रही है। एक रूसी थिंक टैंक ने हथियारों की खरीद के मामले में भारत की पोजीशन समझाई है।
इस साल भारतीय नौसेना में 18 युद्धपोतों को शामिल करने या कमीशन करने की योजना है। नौसेना के इस विस्तार के साथ भारत हथियार खरीदने के मामले में भी दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हो गया है।
रूस के थिंक टैंक सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ वर्ल्ड आर्म्स ट्रेड (CAWAT) के मुताबिक, भारत 2025 में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा। भारत ने करीब 6.97 अरब डॉलर के हथियार खरीदे, जो दुनियाभर में कुल हथियार खरीद का 5.83 फीसदी है।
नौसेना के विस्तार में नए युद्धपोतों और पनडुब्बियों की अहम भूमिका है। भारत समुद्री सुरक्षा मजबूत करने के साथ अपने सैन्य बेड़े की क्षमता भी बढ़ा रहा है। CAWAT के मुताबिक, भारत की बढ़ती हथियार खरीद की बड़ी वजह नौसेना का तेजी से विस्तार करना है।
पिछले साल हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारत ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने पर जोर दिया है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 7 मई को यह ऑपरेशन शुरू किया था। इसके तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर (POK) स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था। पाकिस्तान के पलटवार के बाद दोनों देशों के बीच लगभग चार दिनों का संघर्ष हुआ।
नौसेना में शामिल हो रहे नए युद्धपोत और पनडुब्बियां
भारतीय नौसेना के बेड़े में रूस में बना फ्रिगेट 'तामाल' जुलाई 2025 में शामिल किया गया था। इसके अलावा, रूस की मदद से गोवा शिपयार्ड में दो और प्रोजेक्ट 11356 फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनके निर्माण में रूस की सरकारी हथियार निर्यातक कंपनी Rosoboronexport सहयोग कर रही है।
भारत ने 'वाघशीर' (Vaghsheer) पनडुब्बी को भी नौसेना में शामिल किया है। यह फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप के लाइसेंस के तहत सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स की बनाई गई कलवरी क्लास की छठी और आखिरी पनडुब्बी है। CAWAT के अनुसार, छह पनडुब्बियों के इस प्रोग्राम पर करीब 3.6 अरब डॉलर खर्च हुए हैं।
भारतीय नौसेना के विस्तार की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल 18 युद्धपोतों को शामिल करने या कमीशन करने की योजना है। यह भारतीय नौसेना के इतिहास में सबसे बड़े विस्तार कार्यक्रमों में से एक है।
हथियार खरीद में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर
CAWAT के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने 2025 में 6.97 अरब डॉलर के हथियार आयात किए। इस लिस्ट में पोलैंड 11.91 अरब डॉलर की खरीद के साथ पहले नंबर पर रहा, जबकि ऑस्ट्रेलिया 6.96 अरब डॉलर के हथियार आयात के साथ भारत से मामूली अंतर से पीछे रहा।
भारत की हथियार खरीद में पिछले साल भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2024 में देश ने 3.87 अरब डॉलर के हथियार आयात किए थे, जो 2025 में बढ़कर 6.97 अरब डॉलर हो गए।
हालांकि, चार साल के कुल आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर थोड़ी अलग है। 2022 से 2025 के बीच भारत ने कुल 25.44 अरब डॉलर के हथियार आयात किए। इस अवधि में भारत सऊदी अरब और कतर के बाद तीसरे स्थान पर रहा।
चार साल के लिए बड़ा टारगेट
रूसी थिंक टैंक का अनुमान है कि 2026 से 2029 के बीच भारत करीब 45.65 अरब डॉलर के हथियार आयात कर सकता है। इस अनुमान के मुताबिक, भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना रह सकता है।
इस दौरान पोलैंड के 55.32 अरब डॉलर के हथियार आयात के साथ पहले स्थान पर रहने का अनुमान है। वहीं, जर्मनी 36.48 अरब डॉलर की खरीद के साथ तीसरे नंबर पर रह सकता है।
यह अनुमान दिसंबर 2025 तक मौजूद हथियार खरीद की डील्स, सरकारों की ओर से घोषित खरीद योजनाओं और संभावित टेंडरों पर आधारित है। इसलिए इसे भविष्य में होने वाली वास्तविक खरीद का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
छोटा-सा देश बड़े हथियार खरीद रहा
हथियार खरीदने वाले देशों की लिस्ट में पोलैंड काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसकी हथियार खरीद 2022 में 2.17 अरब डॉलर थी, जो 2025 में बढ़कर 11.91 अरब डॉलर हो गई। इसके पीछे अमेरिका से अब्राम्स और दक्षिण कोरिया से K2 टैंक खरीदने जैसी बड़ी डील्स का बड़ा हाथ रहा है।
CAWAT का अनुमान है कि 2026 से 2029 के बीच दुनियाभर में हथियारों का आयात करीब 633 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह पिछले चार साल की तुलना में 52.5 फीसदी ज्यादा होगा। थिंक टैंक के मुताबिक, इस दौरान वैश्विक हथियार खरीद में यूरोप की हिस्सेदारी भी बढ़ सकती है।
हथियारों की खरीद का हिसाब कैसे लगाया गया?
CAWAT की रैंकिंग उन हथियारों की कीमत के आधार पर तैयार की जाती है, जिनकी खरीद-बिक्री का पता लगाया जा सकता है। इसमें मुफ्त में दिए हथियारों को शामिल नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, पश्चिमी देशों की ओर से यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद इस हिसाब में नहीं जुड़ती।
हथियारों के कारोबार पर नजर रखने वाली दूसरी बड़ी संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) का तरीका अलग है। CAWAT हथियारों की खरीद की कीमत देखता है, जबकि SIPRI बड़े हथियारों के लेन-देन की मात्रा का आकलन करने के लिए अलग पैमाने का इस्तेमाल करता है। इसलिए दोनों संस्थाओं के आंकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती।