नई दिल्ली : देश में चीनी को लेकर चर्चा जोरों पर है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। पहली, करीब एक दशक बाद भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है। दूसरी, घरेलू बाजार में चीनी के दाम बढ़ गए हैं। सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन रॉ शुगर (कच्ची चीनी) को 31 अक्टूबर 2026 तक बिना कस्टम ड्यूटी आयात करने की अनुमति दी है। सरकार का मकसद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाना है। ऐसे में 4 बड़े सवाल उठ रहे हैं। देश में वाकई चीनी की कमी हो गई है? क्या चीनी को विदेश भेजने की भारत की क्षमता कम हुई है? चीनी के दाम कितने बढ़े हैं? इथेनॉल के कारण चीनी उत्पाद पर असर पड़ रहा है?

पहला सवाल: देश में चीनी प्रोडक्शन और खपत

पिछले एक दशक में सभी वर्षों में देश का चीनी प्रोडक्शन घरेलू खपत की तुलना में अधिक रहा है। इसने देश को घरेलू स्तर पर आत्मनिर्भर बनाए रखने के साथ-साथ एक्सपोर्ट के मौके भी बने हैं। सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2016-17 को छोड़कर (जब प्रोडक्शन 202.85 लाख टन और खपत 245.61 लाख टन थी) हमारा प्रोडक्शन हमेशा खपत के मुकाबले अधिक रहा है। ऐसे में हम चीनी के मामले में आत्मनिर्भर रहे हैं। 

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पिछले दो सालों (2022-23 और 2023-24) में चीनी का प्रोडक्शन खपत की तुलना में अधिक ही रहा है। चीनी के प्रोडक्शन की बीच इसकी घरेलू खपत में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। 

दूसरा सवाल: विदेश में चीनी भेजने में कमी आई?

इसका जवाब है हां। भारत का चीनी एक्सपोर्ट घरेलू प्रोडक्शन और खपत के संतुलन से सीधे तौर प्रभावित रहा है। साल 2021-22 में अतिरिक्त प्रोडक्शन के कारण रिकॉर्ड चीनी (110.70 लाख टन) को एक्सपोर्ट किया गया। वहीं 2023-24 में घरेलू डिमांड और स्टॉक मैनेजमेंट के चलते एक्सपोर्ट लगभग ना के बराबर रहा। साल 2014-15 से 2017-18 के शुरुआती दौर में गिरावट देखने को मिली। 2014-15 में 10.94 लाख टन और 2015-16 में 16.56 लाख टन चीनी का एक्सपोर्ट हुआ। घरेलू प्रोडक्शन में कमी के कारण 2016-17 में एक्सपोर्ट गिरकर सबसे निचले स्तर 0.46 लाख टन पर आ गया। 2017-18 में भी निर्यात 4.64 लाख टन ही रहा। 2022-23 में एक्सपोर्ट घटकर 64.00 लाख टन रह गया। 2023-24 में एक्सपोर्ट में भारी गिरावट आई और यह घटकर मात्र 0.50 लाख टन रह गया।

 

साल 2014 से लेकर अबतक सिर्फ दो बार ही भारत को चीनी इंपोर्ट करने की आवश्यकता पड़ी है। सिर्फ 2016-17 (4.46 लाख टन) और 2017-18 (2.15 लाख टन) में ही चीनी विदेश से मंगाई गई थी। इसका मुख्य कारण 2016-17 में घरेलू प्रोडक्शन का गिरकर दशक के सबसे कम लेवल (202.85 लाख टन) पर पहुंचना था। अब फिर एक बार भारत को करीब 10 साल बाद चीनी विदेश से मंगाने का फैसला करना पड़ा है।

तीसरा सवाल: चीनी कितनी महंगी?

सरकार हर साल गन्ने की फसल की बुवाई की शुरुआत में चीनी के उत्पादन का अनुमान लगाती है। इस साल भी सरकार ने फसल के आधार पर 343 लाख मीट्रिक टन का अनुमान लगाया गया था। जबकि देश में चीनी की खपत 280 से 290 लाख मीट्रिक टन होती है। ऐसे में इस साल देश में खपत के मुकाबले चीनी का उत्पादन अधिक होने की उम्मीद थी। इसे देखते हुए सरकार ने चीनी को एक्सपोर्ट करने की अनुमति दे दी।

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इस बीच मौसम के कारण गन्ने की फसल प्रभावित हो गई। इससे हालात बिगड़ गए। बारिश का पानी खेतों में लगा रहा, इससे गन्ने की पैदावार पर असर पड़ा। इसके अलावा, जो गन्ने की पैदावार हुई, उसमें चीनी बनाने की क्षमता काफी कम थी। तकनीकी भाषा में समझे तो उन गन्ने में सुक्रोज कम था।

महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में भी गन्ने की फसल प्रभावित हुई। ऐसे में जो इस साल चीनी का उत्पादन 343 लाख मीट्रिक टन होने की उम्मीद थी वह घटकर 306 लाख मीट्रिक टन के करीब आ चुका है। ऐसे में जब उत्पादन का अनुमान कम होता है तो एक तरह से माहौल बनना शुरू हो जाता है कि इस साल चीनी कम हो रही है। ऐसे में कई बड़े ट्रेडर चीनी की खरीदारी बढ़ा देते हैं या चीनी के स्टॉक को होल्ड करने में लग जाते हैं। इससे बाजार में सप्लाई पर असर दिखता है।

दूसरी तरफ, सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी कई वजहों से हुई है, जिनमें उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों के मौसम में मांग, मौसम की वजह से फसल को नुकसान, ग्लोबल सप्लाई में कमी और इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी शामिल हैं।

10 साल बाद चीनी का इंपोर्ट

फेस्टिव सीजन में चीनी की मांग अधिक हो जाती है। इस बीच देश में पिछले दो महीनों में चीनी की कीमतें लगभग 40% बढ़ गई हैं। रिटेल में 45 से 47 रुपये किलो बिक रही चीनी की कीमतें अब 62 से 65 रुपये प्रतिकिलो तक पहुंच गई हैं। देश में गन्ने की फसल प्रभावित होने के कारण चीनी के प्रोडक्शन पर असर पड़ा है। वहीं, प्रोडक्शन प्रभावित होने के कारण सप्लाई कम हो गई है।

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सरकार चीनी के स्टॉक, कीमतों और बाजार के तौर-तरीकों पर बारीकी से नजर रख रही है। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं कि देश में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रहें। घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। अक्टूबर में शुरू होने वाले नए पेराई सीजन से चीनी की उपलब्धता और बढ़ेगी। संजीव चोपड़ा, सचिव, डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन
संजीव चोपड़ा
संजीव चोपड़ा
सचिव, डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन

इसे देखते हुए, भारत को लगभग 10 साल में पहली बार चीनी इंपोर्ट करना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार ने अब चीनी (Raw Sugar) को इंपोर्ट करने का फैसला लिया है। सरकार के इस फैसले से चीनी को होल्ड करने वाले व्यापारियों पर दबाव भी बनेगा साथ ही बाजार में एक्सपोर्ट की गई चीनी के आने से उपलब्धता भी बढ़ेगी।

सरकार 20 अगस्त को बिना ड्यूटी के इंपोर्ट की अनुमति भी दे दी है। इस योजना की घोषणा के बाद, लंदन में बेंचमार्क वाइट शुगर फ्यूचर्स और न्यूयॉर्क में रॉ शुगर फ्यूचर्स की कीमतों में 4% तक की बढ़ोतरी हुई। भारत चीनी के इंपोर्ट पर 100% ड्यूटी लगाता है।

नॉलेज फैक्ट

देश में एक व्यक्ति एक महीने में औसतन 1.5 किलो चीनी खा जाता है। यह चीनी की खपत चाय, जूस, बिस्किट, शरबत, मिठाई से लेकर प्रोसेस्ड फूड के रूप में है। अनुमानों के अनुसार, कुल मांग का 60-65% हिस्सा इंस्टीट्यूशनल खपत (जैसे फूड और बेवरेज कंपनियां, होटल, रेस्तरां, कैटरिंग सेक्टर और प्रोसेस्ड फूड) से आता है।

चीनी इंपोर्ट का क्या होगा असर

सरकार के इस फैसले का नतीजा यह होगा कि लोकल मार्केट में तेजी से लगभग 3,00,000 टन चीनी आ सकती है। भारत मुख्य रूप से ब्राजील से कच्ची चीनी (रॉ शुगर) इम्पोर्ट कर सकता है। हालांकि, शिपमेंट को भारत पहुंचने में लगभग दो महीने लगेंगे। इसका मतलब है कि इम्पोर्ट से घरेलू सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ेगी। इसका असर अक्टूबर में दिखेगा। सरकार की तरफ से जारी आदेश में कहा गया है कि जिन चीनी मिलों और रिफाइनरियों के पास कच्ची चीनी को सफेद चीनी में बदलने की क्षमता है, उन्हें टैरिफ-रेट कोटा के लिए 21 अगस्त से 28 अगस्त के बीच अप्लाई करना होगा।

आदेश में कहा गया है कि उन इम्पोर्टर्स को प्राथमिकता दी जाएगी जो 15 अक्टूबर तक इम्पोर्ट पूरा करने का वादा करते हैं। मीडिया रिपोर्ट में बॉम्बे शुगर मर्चेंट्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अशोक जैन के हवाले से कहा गया कि भारत की ओर से खरीदारी बढ़ने की खबर के बाद इंटरनेशनल कीमतों में बढ़ोतरी हुई, लेकिन भारत के लिए इम्पोर्ट के फैसले से घरेलू कीमतों में तेजी पर लगाम लगनी चाहिए।

देश में चीनी का यूज अधिक क्यों है?

  • 1.4 अरब से अधिक की आबादी, घरेलू मांग स्वाभिक रूप से सबसे बड़ी है
  • संस्कृति और खानपान की आदतें जिनमें त्योहारों,शादियों से लेकर सामाजिक आयोजन शामिल
  • पैकेज्ड फूड, बेकरी, कन्फेक्शनरी, आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक में यूज

रॉ शुगर क्या होता है?

रॉ शुगर (कच्ची चीनी) उस प्रोडक्ट को कहते हैं जो गन्ने के रस को निकालने और साफ करने से मिलता है। कच्ची चीनी (raw sugar) क्रिस्टल के रूप में होती है। कच्ची चीनी में अधिक अशुद्धियाँ क्रिस्टल की सतह पर मौजूद सिरप की परत में होती हैं। कच्ची चीनी को मशीन में एक गर्म सिरप के साथ मिलाया जाता है। फिर चीनी के केक पर थोड़ा सा 'वॉश वॉटर' छिड़का जाता है ताकि सिरप की आखिरी परतें धुल सकें। धुली हुई कच्ची चीनी में लगभग 99.6% सुक्रोज होता है। यह आगे की रिफाइनिंग प्रोसेस से पहले का शुरुआती रूप है।

चौथा सवाल: इथेनॉल से चीनी उत्पादन प्रभावित हो रहा ?

आम लोगों से लेकर सोशल मीडिया पर एक सवाल खूब छाया है। कई लोगों का कहना है कि जिस गन्ने से चीनी बननी थी उसका यूज इथेनॉल बनाने में किया गया। इस वजह से ही चीनी के दाम बढ़े हैं। वहीं, सरकार ने इस बात से इनकार किया है। गन्ने से सीधे इथेनॉल नहीं बनता है। गन्ना पहले चीनी मिलों के पास जाता है। वहां गन्ने की तीन बार पिराई होती है। गन्ने की पिराई के बाद बचे हुए हिस्से से इथेनॉल बनता है। 

गन्ने की पिराई के तीन लेवल  A, B और C कैटेगरी के बांटा जाता है। पहली पेराई के बाद गन्ने के वेस्ट को A मोलाइसिस, दूसरी पेराई के बाद वाले वेस्ट को B हेवी मोलाइसिस और तीसरी पेराई के बाद वाले हिस्से को C हेवी मोलाइसिस कहते हैं। इथेनॉल बनाने वाली कंपनियां चीनी मिलों से B और C कैटेगरी के गन्ने का मोलाइसिस खरीदती हैं। कई बार जब पेराई अधिक होती है तो गन्ने के जूस से भी इथेनॉल बनता है।

मौजूदा समय में कंपनियां अधिकतर B हेवी मोलाइसिस और C हेवी मोलाइसिस से इथेनॉल बना रही हैं। B हेवी मोलाइसिस से भी इथेनॉल बनाने का भी मामला कम हुआ है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% हो गया है। इसके अलावा, देश में उत्पादित होने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से आता है। ऐसे में चीनी वाले गन्ने से इथेनॉल बनाने की वजह से कीमतों में बढ़ने का सीधे तौर पर संबंध नहीं दिखता है।