एक तरफ अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती होड़, दूसरी तरफ तेजी से उभरती नई ताकतें। दुनिया की स्ट्रैटेजिक तस्वीर बदल रही है और इन बदलावों के बीच भारत 'नए फॉर्मूले' पर आगे बढ़ रहा है। दिल्ली में 62वें म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया के बदलते समीकरणों पर बात की। उन्होंने जोखिम कम करने, सप्लाई चेन मजबूत करने और अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के मुताबिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
लेकिन इन सबके बीच रूस का जिक्र खास रहा। जयशंकर ने बताया कि जब भारत की सिक्योरिटी और टेरिटोरियल इंटेग्रिटी पर खतरा था, तब रूस और उससे पहले सोवियत संघ किस तरह भारत के साथ खड़ा रहा। यानी बदलती दुनिया में दोस्ती का मतलब सिर्फ आज के रिश्ते नहीं, बल्कि पुराने भरोसे और अनुभव भी हैं।
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस दुनिया के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंचों में से एक है, जहां राष्ट्राध्यक्ष, राजनयिक, रक्षा विशेषज्ञ और सैन्य अधिकारी ग्लोबल सिक्योरिटी और जियोपॉलिटिक्स पर चर्चा करते हैं। इसी मंच से जयशंकर ने एक बड़े बदलाव की ओर इशारा किया। दुनिया अब सिर्फ अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों के बीच तय नहीं हो रही, बल्कि कई देश अपने हितों के हिसाब से नए समीकरण बना रहे हैं।
तो पहले समझते हैं कि जयशंकर ने रूस की दोस्ती का कौन सा किस्सा सुनाया। फिर बात करेंगे कि अमेरिका-चीन की होड़ के बीच जयशंकर ने भारत के लिए कौन सा नया रास्ता बताया।
1950 से रिश्ता, खतरे के वक्त साथ था रूस
जयशंकर ने कहा, "भारत और रूस के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से बहुत अच्छे रहे हैं। खासकर 1950 के दशक से। वो इतिहास भूला नहीं है। हमारे लिए रूस, और उससे पहले सोवियत संघ, ऐसा देश था जो कई मायनों में हमारे साथ खड़ा रहा। जब हमारी सिक्योरिटी और टेरिटोरियल इंटीग्रिटी पर खतरा था। उस समय दुनिया का बड़ा हिस्सा हमारे बगल की मिलिट्री रेजीम के साथ खड़ा होना पसंद कर रहा था। रूस से हमारे रिश्ते बहुत अच्छे थे। हम कई मायनों में उसी विरासत से बने हैं।"
रूस के साथ रिश्ता आगे बढ़ चुका है
उन्होंने कहा, "आज रिश्ता उससे आगे बढ़ चुका है। दुनिया बदल गई है। हम बदल गए हैं। रिश्ते 70 और 80 के दशक जैसे नहीं रहे। रूस का मामला भी ऐसा ही है। किसी भी रिश्ते की तरह ये रिश्ता भी नए सिरे से आगे बढ़ा है। नए मुद्दे आए हैं। पुराने मुद्दों में कभी-कभी बदलाव हुए हैं। आज ये काफी हद तक इकोनॉमिक रिश्ता भी है। मिलिट्री कंपोनेंट है। न्यूक्लियर कंपोनेंट है। स्पेस के मुद्दे हैं। दोनों देशों के बीच ट्रेड और इन्वेस्टमेंट की अच्छी खासी मात्रा है।
कॉन्फ्लिक्ट का अंत डायलॉग से
जयशंकर ने कहा, "हम आज एक दुर्भाग्यपूर्ण कॉन्फ्लिक्ट देख रहे हैं। इस पर हमारी पोजीशन साफ है। हम इसका अंत देखना चाहते हैं। इसके लिए डायलॉग और डिप्लोमेसी चाहिए। नेगोशिएशन होना ही होगा। हम कई साल से इसकी वकालत कर रहे हैं। हाल के महीनों में एडवोकेसी से थोड़ा आगे बढ़े हैं। रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ बातचीत चल रही है।"
अब बताते हैं कि विदेश मंत्री जयशंकर ने की 10 बड़ी बातें
- अमेरिका की भूमिका में बड़ा बदलाव: जयशंकर ने कहा कि आज की वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका में बड़ा बदलाव आया है। अमेरिका ने अपनी स्थिति को दोबारा तय किया है और यह बदलाव उसकी अपनी पसंद का हिस्सा है।
- चीन का उभार: विदेश मंत्री ने आगे कहा कि दुनिया के मौजूदा समीकरण में चीन का उभार दूसरा बड़ा पहलू है। चीन खुद को एक अलग तरह की ताकत मानता है। इसके चलते अमेरिका और चीन के बीच काफी तेज प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है।
“चीन खुद को एक अलग और खास तरह की ताकत मानता है। कई मायनों में यह उसकी सोच के साथ-साथ हकीकत भी है। आज अमेरिका और चीन के बीच काफी तेज प्रतिस्पर्धा है। यह मुकाबला अब सिर्फ इन दोनों देशों तक सीमित नहीं है।”- भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर
- अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का दूसरे देशों पर असर: अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा की बात पर उन्होंने आगे कहा कि इसने दूसरे देशों को भी उनके पास मौजूद ताकत और दबदबे का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया के देश एक-दूसरे पर काफी हद तक निर्भर भी हैं।
- ’गोल्डीलॉक्स परिदृश्य’: जयशंकर ने अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों को समझाने के लिए ‘Goldilocks scenario’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों को लेकर दुनिया एक संतुलित स्थिति चाहती है। न तनाव इतना बढ़े कि हालात बिगड़ जाएं और न ही रिश्ते इतने अच्छे हों कि संतुलन ही खत्म हो जाए। दोनों के बीच एक सही स्तर की प्रतिस्पर्धा बनी रहनी चाहिए।”
- उभरती ताकतें क्या हैं?: सम्मेलन को संबोधित करते हुए जयशंकर ने सवाल किया, “हम उभरती हुई ताकतों से क्या मतलब समझते हैं और वे किस स्थिति से उभर रही हैं?” हालांकि, वह यह भी कहते हैं कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है। वह इसे ऐसे समझाते हैं, “कुछ देश ऐसे हैं जो उपनिवेशवाद से निकलकर आगे बढ़ रहे हैं और उनकी अर्थव्यवस्थाएं बढ़ रही हैं। भारत इसका एक अच्छा उदाहरण है। लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं जो अब तक जिस गठबंधन व्यवस्था की सुविधा में रहे हैं, उससे बाहर निकलकर आगे बढ़ रहे हैं।”
- ग्लोबल साउथ और नॉर्थ: विदेश मंत्री कहते हैं कि उभरते देशों को दो हिस्सों में देखा जा सकता है। एक ग्लोबल साउथ के देश हैं और दूसरे ग्लोबल नॉर्थ के। दोनों अलग-अलग तरीकों से बढ़ रहे हैं।
“लेकिन दोनों में एक बात समान है। वे दुनिया में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। यही बात उन्हें एक-दूसरे के करीब लाती है।”
- हर मुद्दे पर एक जैसी सोच की जरूरत नहीं: जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम ताकतों के लिए हर मुद्दे पर एक जैसी राय होना जरूरी नहीं है। अगर कुछ अहम मुद्दों पर हित मिलते हैं, तो देश साथ काम कर सकते हैं।
- जोखिम घटाने और विकल्प बढ़ाने पर जोर: जयशंकर ने कहा कि उभरती और मध्यम ताकतें अब जोखिम कम करने और अपने विकल्प बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। यह सिर्फ अर्थव्यवस्था या सुरक्षा तक सीमित नहीं है। देश अपनी सप्लाई चेन को भी ज्यादा मजबूत बना रहे हैं। वे समान सोच वाले देशों के साथ मुद्दे के हिसाब से सहयोग कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “आज देशों को हर मुद्दे पर एक जैसी सोच रखने की जरूरत नहीं है। अगर उनके बीच कुछ साझा हित हैं, तो वे साथ काम कर सकते हैं। जोखिम कम करने और विकल्प बढ़ाने की इस प्रक्रिया से धीरे-धीरे एक नई वैश्विक व्यवस्था तैयार हो रही है।”
- क्वाड से लेकर BRICS तक सहयोग के नए मॉडल: जयशंकर ने कई मौजूदा समूहों और परियोजनाओं का उदाहरण दिया। उन्होंने क्वाड का जिक्र किया। कनेक्टिविटी के क्षेत्र में इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और नॉर्दर्न सी रूट का उल्लेख किया। उन्होंने BRICS का भी उदाहरण दिया।
- भारत की पहल वाले दो बड़े प्लेटफॉर्म: जयशंकर ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस और कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्लेटफॉर्म दिखाते हैं कि देश किसी एक बड़े शक्ति केंद्र का हिस्सा बने बिना भी साझा हितों के लिए साथ आ सकते हैं।
यह भी पढ़ें- 1 लाख सैनिक या बातचीत? सऊदी के सामने हूतियों को लेकर दो रास्ते, किस तरफ जाएगा रियाद?