'दिल्ली विश्वविद्यालय केवल एक यूनिवर्सिटी नहीं, यहां देश के हर कोने से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। यहां का जनादेश पूरे भारत के युवाओं के मन का प्रतिबिंब होता है। ABVP को मिली शानदार जीत उन राष्ट्र विरोधी ताकतों के लिए स्पष्ट संदेश है, जो युवा शक्ति को राष्ट्रविरोधी एजेंडे की प्रयोगशाला बनाना चाहते हैं।'
- अमित शाह, गृह मंत्री (भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष)
'यह जीत 'राष्ट्र प्रथम' की भावना पर आधारित सकारात्मक और रचनात्मक छात्र राजनीति में युवाओं के निरंतर विश्वास और 'विकसित भारत' के विजन में योगदान देने के उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाती है।'
- नितिन नवीन, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
'कांग्रेस और राहुल गांधी की झूठ की गूंज से छात्र चुनाव को प्रभावित करने के तमाम प्रयासों के बावजूद Gen Z ने अपने विवेक से राष्ट्रहित की विचारधारा को चुना है।'
- पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड
जब से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के नतीजे आए हैं, भारतीय जनता पार्टी के नेता कुछ इसी तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। अध्यक्ष पद का चुनाव जीते यश डबास ने कहा है कि GEN-Z एबीवीपी के साथ खड़ा है।
अब कांग्रेस की बात
जिस दिन डूसू चुनाव के नतीजे आए, कांग्रेस नेता राहुल गांधी इंदौर में छात्रों के प्रोग्राम में थे। कांग्रेस के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस कार्यक्रम के कई वीडियो शेयर किए गए, वह स्टूडेंट्स का जिक्र करते हुए सरकार पर निशाना साध रहे थे।
राहुल के मंच से मध्य प्रदेश के सरकारी छात्रावासों में 'बहुत सी बुनियादी समस्याओं' का जिक्र हुआ। कांग्रेस ने एक पोस्ट के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि राहुल गांधी 'Gen-Z Ki Awaaz' हैं।
हालांकि, DUSU चुनाव नतीजों पर ज्यादातर कांग्रेस के नेता चुप हैं। तीन पद एबीवीपी (भाजपा का छात्र संगठन) को मिले हैं और एक निर्दलीय को। इसमें भी कांग्रेस का बैडलक रहा। दीपांशु शौकीन को टिकट NSUI से मिलना था लेकिन दिया नहीं, तो वह निर्दलीय जीत गए।
ऐसे में सवाल उठता है कि जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद अचानक Gen-Z फोकस में क्यों आ गए हैं? और क्या सच में DUSU चुनाव पूरे भारत का मिजाज बता रहा है?
वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री कहते हैं कि DUSU के नतीजे तो निश्चित तौर पर एबीवीपी के फेवर में हैं। कांग्रेस आगे चल रही थी लेकिन 15 राउंड के बाद हार गई। क्या छात्रसंघ का ये चुनाव कोई नैशनल पिक्चर पेश कर रहा है? इस पर वरिष्ठ पत्रकार का जो जवाब था, वह छात्रसंघ चुनाव से आगे जाकर जेन-ज़ी पॉलिटिक्स पर भी रोशनी डालता है।
वो छात्रसंघ चुनाव, जिसकी चर्चा ही नहीं
हां, शुक्रवार को ही डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी पोस्ट ग्रेजुएट यूनियन इलेक्शन के भी नतीजे आए हैं, लेकिन उसकी चर्चा नहीं है। इसमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने 18 में से 11 पदों पर कब्जा जमाया। NSUI (कांग्रेस समर्थित स्टूडेंट विंग) ने चार पद जीते, जबकि असम छात्र परिषद की झोली में तीन पद आए। गौर करने वाली बात है कि NSUI समर्थित कैंडिडेट ही प्रेसिडेंट बना है।
AASU का जिक्र जरूरी है क्योंकि इस यूनियन से होकर देश को कई बड़े नेता मिले हैं। सर्बानंद सोनोवाल पहले इसी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष थे, बाद में मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री बने। कई बड़े नेता AASU से भाजपा में आए हैं। यहां भी युवा और जेन-ज़ी फैक्टर हैं लेकिन इसकी बात नहीं हो रही है।
विनोद अग्निहोत्री साफ कहते हैं कि किसी एक छात्रसंघ के चुनाव से आप यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि पूरे देश का मूड क्या है, लेकिन हां, कांग्रेस (एनएसयूआई) जीत जाती तो वह भी नैरेटिव बनाती कि देखिए DUSU के चुनाव ने बता दिया कि Gen-Z बीजेपी के खिलाफ हैं। अब एबीवीपी जीती है इसलिए भाजपा उसे अपने पक्ष में प्रचारित कर रही है।
Gen-Z की तरफ सबका फोकस क्यों है?
इस समय सोशल मीडिया रील्स, तस्वीरों से लेकर पार्टियों की सारी स्ट्रैटिजी यूथ पर फोकस्ड हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि हर चुनाव में पार्टियां पहली बार वोट डालने जा रहे लोगों को अपनी तरफ लुभाने का प्रयास करती हैं।
क्योंकि फर्स्ट टाइमर वोटर की राय बिल्कुल नई होती है।
क्योंकि उसकी राय जल्दी बदल भी सकती है।
क्योंकि उसे अपनी राय बनानी होती है।
हालांकि, जो कई बार वोट डाल चुका होता है, वह एक तरफ जुड़ जाता है। 40-50 साल के लोगों की राय बदलने में टाइम लगता है इसलिए जेन-ज़ी पर फोकस हमेशा रहता है और रहेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि जेन ज़ी में भी अलग-अलग सोच वाले लोग हैं। कुछ जंतर मंतर पर बैठते हैं, तो कुछ कांवड़ लेकर भी जाते हैं। सारे नौजवान एक जैसा नहीं सोचते हैं।
एक दूसरा वर्ग भी है: नौजवानों के साथ महिलाओं का दूसरा बड़ा वर्ग है, जो साइलेंट वोटर कहे जाते हैं। एक जमाना था जब पतियों या परिवार के कहने पर महिलाएं वोट डालती थीं, लेकिन 10-15 साल में चीजें बदली हैं। अब जरूरी नहीं पति और पत्नी एक ही उम्मीदवार को वोट दें।
'कांग्रेस के लिए झटका तो है ही'
हां, DUSU चुनाव नतीजे को वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कांग्रेस के लिए झटका बताते हैं।
उन्होंने कहा कि उस दिन जब छात्रों की गूंज वाला राहुल गांधी का कार्यक्रम था, यह नतीजे एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। उनके लिए यह भी सोचने का समय है कि इस तरह की राजनीति से वे जमीन पर आएंगे या दूसरा रास्ता खोजना होगा। कांग्रेस जीत भी जाती तो क्या हो जाता क्योंकि DUSU का चुनाव कोई राजनीति का बैरोमीटर नहीं है। जैसे जेएनयू में आमतौर पर लेफ्टिस्ट जीतते हैं लेकिन देश में क्या स्थिति है? केरल में भी सत्ता से बाहर हो गए।
उन्होंने कहा कि इस वक्त जेन ज़ी एजुकेशन की काफी चर्चा है। एक मुद्दा बना हुआ था कि क्या ये चुनाव नतीजे बीजेपी के खिलाफ जाएंगे? अगर ऐसा होता तो बीजेपी के लिए थोड़ी असहज स्थिति बनती लेकिन कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिला।
प्रमोद जोशी ने कहा कि यह भी समझना होगा कि उत्तर भारत की राजनीति केवल युवाओं से नहीं चलती है। हमारे देश में अब भी जाति, धर्म, क्षेत्र जैसी चीजें काफी मायने रखती हैं। हां, युवाओं की भूमिका एक फैक्टर के तौर पर महत्वपूर्ण जरूर होती है।
एक लाइन में कहा जा सकता है कि भाजपा अब अपना नैरेटिव तैयार कर सकती है कि युवा उसके साथ है और कांग्रेस की विडंबना यह है कि वह जो भी पासा फेंकती है, उल्टा पड़ जाता है।
आखिर में दिलचस्प बात
अरुण जेटली से लेकर रेखा गुप्ता तक DUSU से ही निकले हैं। विस्तार से यहां पढ़िए