दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन यानी DUSU के 2026-27 चुनाव में ABVP ने चार प्रमुख पदों में से तीन पर जीत दर्ज की है। यश डबास प्रेसिडेंट, रिया छावड़ी सेक्रेटरी और लक्ष्य राज सिंह जॉइंट सेक्रेटरी चुने गए हैं। वहीं, पूर्व NSUI सदस्य और निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने वाइस प्रेसिडेंट पद पर जीत दर्ज की।
20 राउंड की काउंटिंग के बाद प्रेसिडेंट पद पर यश डबास को 24576 वोट मिले। NSUI के विजय मीणा को 22523 वोट। मार्जिन 2053 वोटों का रहा। वाइस प्रेसिडेंट पद पर दीपांशु शौकीन 30615 वोट के साथ सबसे आगे रहे। ABVP के ईशू मौर्या को 16910 और NSUI के वीर चतरथ को 4313 वोट मिले। सेक्रेटरी पद पर रिया छाबड़ी को 21650 और नम्रता चौधरी को 14869 वोट मिले। जॉइंट सेक्रेटरी पद पर लक्ष्य राज सिंह 16641 वोट के साथ जीते। विशेष यादव को 15778 और गोपाल चौधरी को 15106 वोट मिले।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में कुल 91 कॉलेज हैं, लेकिन DUSU यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के चुनाव में 52 कॉलेज और फैकल्टी सीधे हिस्सा लेते हैं। 2026 के चुनाव में इन संस्थानों के 1.51 लाख से ज्यादा छात्र वोट डालने के लिए एलिजिबल थे, जिनमें से लगभग 40% ने मतदान किया।
सेंट स्टीफंस कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज और जीसस एंड मैरी कॉलेज जैसे कुछ कॉलेज DUSU के केंद्रीय चुनाव में शामिल नहीं हैं। स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग यानी SOL के छात्र भी DUSU के केंद्रीय चुनाव में वोट नहीं करते हैं।
DUSU के नतीजों के साथ एक बार फिर इस छात्र संगठन के राजनीतिक इतिहास की चर्चा शुरू हो गई है। पिछले सात दशकों में यहां से कई सांसद, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विधायक निकले हैं।
DUSU की शुरुआत से शुरू करते हैं
DUSU की नींव 1947 में पड़ी। 6 अगस्त 1947 को दिल्ली यूनिवर्सिटी की एग्जिक्यूटिव काउंसिल ने छात्र संघ बनाने का प्रस्ताव मंजूर किया। इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट के प्रमुख वीकेआरवी राव की अगुआई में एक प्रोविजनल कमेटी बनी। इस कमेटी ने कॉलेज यूनियनों के प्रेसिडेंट्स को साथ लाकर संविधान तैयार किया। औपचारिक उद्घाटन 9 अप्रैल 1949 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया। पहला DUSU चुनाव 1954 में हुआ।
कहानी सिर्फ छात्र चुनावों तक सीमित नहीं है
DUSU से पहले भी दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति सक्रिय थी। 1942 में क्विट इंडिया मूवमेंट के दौरान हिंदू कॉलेज, सेंट स्टीफंस और इंद्रप्रस्थ कॉलेज के छात्रों ने जेल में बंद नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर आंदोलन किया था। यह आंदोलन DUSU बनने से पहले का है। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति देश के बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से जुड़ती रही।
1973 में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने DUSU चुनावों में डायरेक्ट वोटिंग शुरू की। इससे पहले कॉलेजों के काउंसलर्स DUSU के पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। डायरेक्ट वोटिंग के बाद हर छात्र चुनाव में वोट डाल सकता था। इससे चुनाव का दायरा बड़ा हुआ और राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों की दिलचस्पी भी बढ़ी।
अरुण जेटली से लेकर रेखा गुप्ता तक... रहे DUSU प्रेसिडेंट
DUSU से निकले नेताओं की राजनीतिक यात्रा भी इस छात्र संगठन की अहमियत बताती है। अरुण जेटली 1974-75 में DUSU प्रेसिडेंट रहे। इससे पहले 1973 में डायरेक्ट वोटिंग वाले पहले चुनाव में वाइस प्रेसिडेंट चुने गए थे। अरुण जेटली केंद्र में फाइनेंस मिनिस्टर रहे और राज्यसभा में लीडर ऑफ द हाउस भी रहे।
रेखा गुप्ता 1996-97 में DUSU की प्रेसिडेंट थीं। बाद में वह दिल्ली BJP की जनरल सेक्रेटरी और BJP महिला मोर्चा की नेशनल वाइस प्रेसिडेंट बनीं। वह आज दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं।
1984-85 में DUSU के वाइस प्रेसिडेंट रहे विजेंद्र गुप्ता बाद में दिल्ली विधानसभा के स्पीकर बने। 1977-78 में DUSU के प्रेसिडेंट रहे विजय गोयल बाद में केंद्र में मंत्री बने।
DUSU से राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचने वाले नेताओं में कांग्रेस से जुड़े नाम भी हैं। NSUI के अजय माकन 1985-86 में DUSU के प्रेसिडेंट रहे और बाद में केंद्र में मंत्री बने।
अलका लांबा 1995-96 में NSUI की ओर से DUSU की प्रेसिडेंट रहीं और बाद में ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।
जब DUSU में धन और बाहुबल को लेकर उठने लगे सवाल
इन नेताओं के राजनीतिक करियर के साथ DUSU चुनावों की अहमियत भी बढ़ती गई। राजनीतिक दलों ने यहां मजबूत उम्मीदवार उतारने शुरू किए, कैंपेन बड़े होते गए और मीडिया की दिलचस्पी बढ़ती गई। इसके साथ चुनावों में पैसे और बाहुबल के इस्तेमाल को लेकर सवाल भी उठे।
2006 में लिंगदोह कमेटी की गाइडलाइंस लागू की गईं। इनमें चुनावी खर्च की सीमा, उम्मीदवारों की उम्र से जुड़े नियम और कैंपेन के तरीकों पर पाबंदियां शामिल थीं। इन नियमों का मकसद छात्र चुनावों को ज्यादा पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना था। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने इन गाइडलाइंस के उल्लंघन को लेकर चिंता जताई। शुक्रवार को कोर्ट ने DUSU चुनाव नतीजों के बाद विजय जुलूस निकालने पर रोक लगा दी। यह रोक सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि यूनिवर्सिटी कैंपस और हॉस्टल्स में भी लागू होगी।
DUSU चुनावों को अक्सर कैंपस से बाहर भी राजनीतिक दिलचस्पी के साथ देखा जाता है। सात दशक से ज्यादा समय में यहां से निकले नेताओं का राजनीतिक सफर बताता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति कई नेताओं के लिए राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने का शुरुआती मंच रही है।