EXPLAINER: इंसानों का बनाया 'सूरज' आखिर धरती पर करेगा क्या?

आसमान में चमकते सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की कोशिश अब धरती पर भी हो रही है। लेकिन इंसानों का बनाया ये ‘सूरज’ आखिर कैसे काम करेगा और कामयाब हुआ तो हमारी जिंदगी में क्या बदलेगा?

सोचिए... जिस सूरज को हम रोज आसमान में देखते हैं, उसकी ताकत वाला सूरज अगर हम धरती पर उतार दें तो क्या होगा? इस सूरज की गर्मी और रोशनी धरती पर ही पैदा होने लगे यानी कोई छोटा सूरज नहीं, जिसे आसमान में टांगा जा सके... बल्कि एक ऐसी मशीन, जिसके अंदर वही प्रक्रिया चलाने की कोशिश हो रही है, जिससे असली सूरज अरबों साल से ऊर्जा पैदा कर रहा है।

इसे ही कहा जा रहा है ‘ कृत्रिम सूरज’ यानी आर्टिफिशियल सन (Artificial Sun)।

और दिलचस्प बात ये है कि इस दौड़ में सिर्फ चीन ही नहीं, भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

आखिर ये ‘आर्टिफिशियल सूरज’ है क्या?

सबसे पहले एक भ्रम दूर कर लेते हैं। वैज्ञानिक धरती पर असली सूरज बनाने की कोशिश नहीं कर रहे। वे सूरज के काम करने का तरीका दोहराने की कोशिश कर रहे हैं।

सूरज के अंदर हाइड्रोजन के छोटे-छोटे कण लगातार आपस में जुड़ते रहते हैं। इसी जुड़ने की प्रक्रिया से जबरदस्त ऊर्जा पैदा होती है। इसे न्यूक्लियर फ्यूजन (Nuclear Fusion) यानी परमाणु संलयन कहा जाता है। आसान भाषा में कहें तो दो हल्के कण मिलकर एक भारी कण बनाते हैं और इस दौरान बहुत बड़ी मात्रा में एनर्जी निकलती है। 

यही एनर्जी सूरज को चमकाती है और धरती तक गर्मी और रोशनी पहुंचाती है। वैज्ञानिकों की कोशिश है कि इसी प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से चलाकर बिजली बनाई जाए।

लेकिन धरती पर सूरज बनाना कितना आसान है?

सूरज के अंदर फ्यूजन अपने आप इसलिए चलता रहता है क्योंकि वहां बेहद ज्यादा तापमान के साथ जबरदस्त दबाव और गुरुत्वाकर्षण (gravitation) मौजूद है।

धरती पर ऐसी प्राकृतिक परिस्थितियां नहीं हैं।

इसलिए वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक खास मशीन बनाई है- टोकामक (Tokamak)।

दिखने में यह कुछ-कुछ बड़े डोनट या गोल छल्ले जैसी होती है। इसके अंदर गैस को इतना गर्म किया जाता है कि वह प्लाज्मा में बदल जाती है। प्लाज्मा को आप पदार्थ की ऐसी अवस्था समझ सकते हैं, जिसमें परमाणु बेहद ऊर्जावान हो जाते हैं।

अब आती है सबसे मुश्किल चुनौती- इस बेहद गर्म प्लाज्मा को मशीन की दीवारों से छूने नहीं देना। इसके लिए शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल किया जाता है।

भारत में 20 करोड़ डिग्री से ज्यादा गर्म प्लाज्मा!

भारत भी इसी तकनीक पर काम कर रहा है।

गुजरात स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) में वैज्ञानिक SST-1 टोकामक के जरिए फ्यूजन से जुड़ी तकनीक विकसित कर रहे हैं। यहां प्लाज्मा का तापमान 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तक पहुंच चुका है।

तुलना के लिए समझिए- सूरज के केंद्र का तापमान करीब 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस माना जाता है। यानी लैब में तैयार किया गया प्लाज्मा सूरज के केंद्र से भी कई गुना ज्यादा गर्म हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत ने बिजली बनाने वाला सूरज तैयार कर लिया है।

असल चुनौती तापमान तक पहुंचने के बाद शुरू होती है- इस प्लाज्मा को स्थिर रखना और लंबे समय तक नियंत्रित करना।

भारत का नया ‘जाइरोट्रॉन’ क्यों अहम है?

इसी दिशा में भारत ने SST-1 के लिए नया जाइरोट्रॉन सिस्टम (Gyrotron system) चालू किया है।

यह 400 किलोवाट क्षमता का सिस्टम है और इसका काम हाई-फ्रीक्वेंसी माइक्रोवेव ऊर्जा के जरिए प्लाज्मा को गर्म करने और उसे नियंत्रित रखने की क्षमता को बेहतर करना है।

आसान भाषा में कहें तो- 

फ्यूजन में सिर्फ आग जलाना काफी नहीं है, उस आग को काबू में रखना असली चुनौती है। भारत फिलहाल इसी तकनीक को समझने और बेहतर बनाने के चरण में है।

तो क्या अब भारत में फ्यूजन से बिजली बनने लगेगी?

नहीं। यह बात समझना बहुत जरूरी है।

भारत का SST-1 अभी कोई ऐसा पावर प्लांट नहीं है, जहां फ्यूजन से बिजली बनाकर घरों तक भेजी जा रही हो। फिलहाल वैज्ञानिक उस तकनीक को विकसित कर रहे हैं, जो भविष्य में लगातार और नियंत्रित तरीके से फ्यूजन ऊर्जा हासिल करने में मदद कर सके। यानी आर्टिफिशियल सूरज अभी बिजलीघर नहीं, बल्कि भविष्य की बिजली के लिए एक प्रयोगशाला है।

अब चीन की बारी... 2035 का लक्ष्य

भारत के साथ-साथ चीन भी फ्यूजन की इस दौड़ में बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है। चीन के पास पहले से EAST यानी Experimental Advanced Superconducting Tokamak है, जिसे अक्सर ‘आर्टिफिशियल सूरज’ कहा जाता है।

चीन का लक्ष्य फ्यूजन तकनीक को लैब से निकालकर भविष्य में कमर्शियल ऊर्जा उत्पादन तक ले जाना है।

यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा- चीन का ‘आर्टिफिशियल सूरज’ भी असली सूरज नहीं है। यह भी टोकामक आधारित एक मशीन है, जिसमें सूरज जैसी फ्यूजन प्रक्रिया को नियंत्रित तरीके से दोहराने की कोशिश की जाती है।

चीन आखिर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है?

क्योंकि अगर फ्यूजन तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल होती है, तो ऊर्जा की दुनिया बदल सकती है। आज दुनिया बिजली और ईंधन के लिए कोयला, तेल, गैस, परमाणु विखंडन, सौर और पवन ऊर्जा जैसे अलग-अलग स्रोतों पर निर्भर है।

लेकिन फ्यूजन का आकर्षण कुछ और है।

इसमें इस्तेमाल होने वाले ईंधन के संभावित स्रोत बेहद प्रचुर माने जाते हैं और फ्यूजन प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन जैसा नहीं होता।

यानी सपना सिर्फ ज्यादा बिजली पैदा करना नहीं है… सपना ऐसी ऊर्जा का है, जो कम कार्बन उत्सर्जन के साथ बड़े पैमाने पर लगातार बिजली दे सके।

आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलेगा?

अब सबसे बड़ा सवाल- इससे आपका क्या लेना-देना?

अगर फ्यूजन तकनीक सफल होकर बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन के लायक बनती है, तो इसका असर सीधे आपकी जिंदगी पर पड़ सकता है।

लेकिन यहां एक बड़ा ‘अगर’ है।

सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी है

फ्यूजन का सिद्धांत वैज्ञानिकों को दशकों से पता है। असली मुश्किल है इसे ऐसी मशीन में लगातार चलाना, जिसमें फ्यूजन से निकलने वाली ऊर्जा को उस प्रक्रिया को चलाने में लगने वाली ऊर्जा से कहीं ज्यादा बनाया जा सके, और फिर उस ऊर्जा को व्यावहारिक तरीके से बिजली में बदला जा सके।